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जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की केंद्रीय बैठक में ईरान पर हमले की निंदा,कहा- दोहरे मापदंड से खतरे में विश्व शांति

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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की केंद्रीय सलाहकार परिषद की बैठक 22 जून को अमीर जमाअत सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी की अध्यक्षता में शुरू हुई। बैठक के पहले दिन परिषद ने कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए, जिनमें ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों की कड़ी निंदा की गई और भारत सरकार से सक्रिय कूटनीतिक पहल की मांग की गई।

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अमेरिकी-इजरायली हमलों की तीव्र निंदा: “यह मानवता को विनाश की ओर ले जाने वाला घृणित कृत्य है”

परिषद ने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमले न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन हैं, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की शांति और स्थिरता के लिए घातक खतरा हैं। इजरायल की विस्तारवादी नीति और अमेरिका की सैन्य आक्रामकता को इस संकट का मुख्य ज़िम्मेदार बताया गया।


परमाणु सुविधाओं पर बमबारी: “प्रमाणहीन आरोपों पर हुआ हमला, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मौन”

सलाहकार परिषद ने जोर देकर कहा कि अभी तक कोई भी अंतरराष्ट्रीय संगठन यह प्रमाण नहीं दे सका है कि ईरान ने परमाणु समझौते की शर्तें तोड़ी हैं। इसके बावजूद अमेरिकी हमले को शांति और न्याय की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के विरुद्ध एक गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक कदम बताया गया।


मानवीय संकट गहराया: “निर्दोषों की मौत, विस्थापन और बुनियादी सेवाओं का पतन”

बैठक में बताया गया कि अमेरिकी-इजरायली हमलों के परिणामस्वरूप हजारों नागरिक मारे गए हैं, बुनियादी ढांचा तबाह हो गया है, और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। परिषद ने चेतावनी दी कि यह संकट केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानवता को प्रभावित करेगा।


विश्व शक्तियों पर दोहरे मानदंड का आरोप: “इजरायल के हमले रक्षात्मक, ईरान की प्रतिक्रिया आतंकवाद?”

परिषद ने विश्व शक्तियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। प्रस्ताव में कहा गया कि एक ओर इजरायल के हमलों को ‘आत्मरक्षा’ बताया जाता है, वहीं ईरान की प्रतिक्रियाओं को ‘आतंकवाद’ की संज्ञा दी जाती है। यह दोहरापन विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है।


🇮🇳 भारत से अपेक्षा: “विदेश नीति के आदर्शों पर अडिग रहे भारत, निभाए जिम्मेदारी”

जमाअत ने भारत सरकार से मांग की है कि वह इस युद्ध को रोकने के लिए एक सक्रिय, संतुलित और नैतिक भूमिका निभाए, साथ ही उपनिवेशवाद के विरोध और तीसरी दुनिया के पक्ष में अपनी ऐतिहासिक विदेश नीति को बनाए रखे।


अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मुस्लिम देशों से अपील: “अब मौन नहीं, मिलकर करें निर्णायक हस्तक्षेप”

बैठक में मुस्लिम देशों से आग्रह किया गया कि वे ईरान के प्रति इस्लामी भाईचारे की भावना के तहत केवल निंदा तक सीमित न रहें, बल्कि मिलकर ठोस रणनीति बनाएं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाएं ताकि अमेरिकी-इजरायली आक्रमण रोका जा सके।


शांतिप्रिय नागरिकों से आह्वान: “अब समय है आवाज़ बुलंद करने का”

जमाअत की केंद्रीय सलाहकार परिषद ने भारत सहित विश्व के सभी न्यायप्रिय, शांति-प्रिय और जागरूक नागरिकों से अपील की कि वे ईरान और पूरे मध्य-पूर्व के उत्पीड़ित लोगों के समर्थन में आगे आएं और ज़ायोनी तथा अमेरिकी आक्रमण के खिलाफ सशक्त आवाज़ उठाएं।


निष्कर्ष:
यह प्रस्ताव केवल एक औपचारिक निंदा नहीं, बल्कि एक वैचारिक दस्तावेज़ है जो आज की वैश्विक राजनीति में न्याय, मानवता और नैतिकता की पुनर्स्थापना की मांग करता है।