मुगलकाल में दिवाली का जश्न था जश्न-ए-चरागां
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गुलरुख जहीन
दिवाली को आमतौर पर हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में गिना जाता है। भगवान राम की अयोध्या वापसी, भगवान महावीर के निर्वाण और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस जैसे अलग-अलग धार्मिक प्रसंगों से भी यह पर्व जुड़ा हुआ है। लेकिन भारत में दिवाली का इतिहास केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं रहा। सदियों से यह त्योहार सामाजिक मेलजोल, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साझा उत्सव का भी हिस्सा रहा है।
मुगलकालीन भारत इसका एक दिलचस्प उदाहरण प्रस्तुत करता है। उस दौर में दिवाली को ‘जश्न-ए-चरागां’ यानी रोशनी का उत्सव कहा जाता था। मुगल दरबार में इस अवसर पर दीप जलाए जाते, आतिशबाजी होती और गरीबों में धन बांटा जाता था। दिल्ली के लाल किले से लेकर चांदनी चौक तक उत्सव का माहौल दिखाई देता था। शाही परिवार के सदस्य भी इस आयोजन में हिस्सा लेते थे।
इतिहासकारों और पुराने साहित्य में दर्ज विवरण बताते हैं कि मुगल शासकों के समय भारत की सांस्कृतिक परंपराएं एक-दूसरे से लगातार प्रभावित हो रही थीं। त्योहारों में भागीदारी इसी साझा संस्कृति का हिस्सा थी।

अकबर के दरबार से शुरू हुई दिवाली की शाही परंपरा
मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में दिवाली को दरबार में विशेष उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला। अकबर भारत की विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में दिलचस्पी रखते थे। उनकी नीतियों में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक मेलजोल को महत्वपूर्ण स्थान मिला।
अकबर के दरबारी इतिहासकार और वजीर अबुल फजल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘आइने-अकबरी’ में शाही उत्सवों का उल्लेख किया है। उनके विवरण के अनुसार, दिवाली का आयोजन दशहरा के आसपास शुरू होता था और कई दिनों तक चलता था। इस दौरान मिठाइयां बांटी जाती थीं। घेवर, पेठा, खीर, पेड़ा, जलेबी और शाही टुकड़ा जैसी मिठाइयों का उल्लेख इस उत्सव से जुड़ी खानपान की परंपरा को भी सामने लाता है।
अकबर की सांस्कृतिक रुचि केवल त्योहारों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने संस्कृत के महाकाव्य रामायण का फारसी में अनुवाद करवाया, ताकि दरबार के लोग भी उसकी कथा और विचारों को समझ सकें। ‘आइने-अकबरी’ में दर्ज विवरणों के अनुसार, रामायण के फारसी अनुवाद के प्रसंगों का दरबार में पाठ और मंचन भी किया जाता था। यह उस दौर में अलग-अलग भाषाओं और धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद का महत्वपूर्ण उदाहरण था।
शाहजहां ने दिल्ली में बढ़ाई रोशनी की रौनक
अकबर के बाद उनके वंशज शाहजहां ने भी मुगल दरबार में दिवाली मनाने की परंपरा जारी रखी। आगरा से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित करने के बाद उन्होंने शाहजहानाबाद बसाया। आज इसी ऐतिहासिक शहर का बड़ा हिस्सा पुरानी दिल्ली के नाम से जाना जाता है।
शाहजहां के समय दिवाली के अवसर पर पारंपरिक तेल के दीयों के साथ आतिशबाजी का आयोजन भी लोकप्रिय हुआ। लाल किले और उसके आसपास रोशनी की सजावट की जाती थी। शाही परिवार और दरबार से जुड़े लोग उत्सव में शामिल होते थे।
मुगल शासन के सभी बादशाहों की धार्मिक नीतियां एक जैसी नहीं थीं। औरंगजेब के शासनकाल में दरबार में होली और दिवाली जैसे उत्सवों को लेकर पाबंदियां लगाई गईं। इसके बावजूद बाद के कई मुगल शासकों के समय दिवाली और अन्य स्थानीय त्योहारों की परंपराएं फिर दिखाई देती हैं।
मोहम्मद शाह रंगीला की दिवाली और लाल किले की जगमगाहट
मुगलकालीन दिवाली का सबसे आकर्षक विवरण बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल से जुड़ा है। उनका शासन 1719 से 1748 तक रहा। इतिहासकार राणा सफवी ने अपनी पुस्तक ‘शाहजहानाबाद: द लिविंग सिटी ऑफ ओल्ड दिल्ली’ में उस समय के दिवाली उत्सव का विस्तार से उल्लेख किया है।
उनके अनुसार, दिवाली पर लाल किले का रंग महल दीयों से जगमगा उठता था। एक प्रसिद्ध चित्र में मोहम्मद शाह रंगीला को महल के बाहर कुछ महिलाओं के साथ दिवाली मनाते हुए दिखाया गया है। रंगीला उनका काव्य नाम भी था।
इस अवसर पर बादशाह को सोने और चांदी से तौला जाता था। इसके बाद यह धन गरीबों में बांट दिया जाता था। कहा जाता है कि शाही परिवार की कुछ महिलाएं कुतुब मीनार की ऊंचाई पर जाकर रोशनी और आतिशबाजी का नजारा देखती थीं।
लाल किले की दीवारों के पास आतिशबाजी का आयोजन होता था। इसकी जिम्मेदारी ‘मीर आतिश’ नामक अधिकारी की होती थी। उत्सव का एक खास आकर्षण ‘आकाश दीया’ था। इसे लगभग 40 गज ऊंचे खंभे पर लगाया जाता था। इसे सोलह रस्सियों के सहारे मजबूती से बांधा जाता था। इसमें बिनौला यानी कपास के बीज से निकले तेल का इस्तेमाल होता था। इसकी रोशनी से शाही दरबार और आसपास का इलाका जगमगा उठता था।
दिल्ली के इतिहास पर लिखने वाले पत्रकार और लेखक आरवी स्मिथ के अनुसार, मोहम्मद शाह रंगीला के समय चांदनी चौक की दिवाली भी बेहद प्रसिद्ध थी। बादशाह अपने शाही काफिले और महल की महिलाओं के साथ वहां जाते थे। उनकी इस वार्षिक यात्रा के कारण चांदनी चौक की दिवाली को ‘रंगीला की दिवाली’ कहा जाने लगा।
एक मुसलमान होने के बावजूद, जब अकबर ने 1586 में कश्मीर जीता, तो उसने हिंदू रीति-रिवाजों का सम्मान किया। वह हर साल दिवाली पर अपने महल को रोशनी से सजाता था और दिवाली को ‘जश्न-ए-चिराग’ के रूप में मनाता था। #HappyDiwali2026 🪔 ❤️🙏 The festival of lights 🪔 ✨️ https://t.co/TYk47AG3YC
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दिवाली से आगे दशहरा और रामलीला में भी शामिल होता था दरबार
मुगलकालीन सांस्कृतिक मेलजोल केवल दिवाली तक सीमित नहीं था। दशहरा और रामलीला जैसे हिंदू त्योहारों को भी शाही संरक्षण और सार्वजनिक भागीदारी मिलती थी।
लेखक महेश्वर दयाल की पुस्तक ‘आलम में इंतखाब: दिल्ली’ में पुराने दिल्ली शहर के त्योहारों और परंपराओं का उल्लेख मिलता है। शाहजहां ने जब दिल्ली को राजधानी बनाया, तो उन्होंने अपनी सेना और शहर की हिंदू आबादी के प्रमुख त्योहारों को संरक्षण दिया। दशहरा भी उनमें शामिल था। यमुना नदी के किनारे लाल किले के पीछे हिंदू सैनिकों के लिए दशहरा उत्सव आयोजित किया जाता था।
उस दिन शाही दरबार में विशेष आयोजन होता था। हिंदू मान्यता के अनुसार शुभ और विजय का प्रतीक माने जाने वाले नीलकंठ पक्षी को बादशाह के सामने छोड़ा जाता था। दूसरी ओर, तैमूरी परंपरा में विजय और सफलता के प्रतीक बाज को भी बादशाह के हाथ पर बैठाया जाता था। दोनों परंपराओं का एक ही आयोजन में दिखाई देना सांस्कृतिक मेलजोल का उल्लेखनीय उदाहरण था।
दशहरे के अवसर पर दरबारियों और नागरिकों को पुरस्कार भी दिए जाते थे। शाही अस्तबल के घोड़ों को सजाया जाता था। उनके खुरों पर मेहंदी लगाई जाती और माथे पर सुंदर आकृतियां बनाई जाती थीं। घोड़ों को आभूषणों से सजाकर लाल किले में बादशाह के सामने पेश किया जाता था। सबसे सुंदर घोड़ों को तैयार करने वाले कर्मचारियों को इनाम मिलता था। हाथियों और घोड़ों को शहर के अमीरों की हवेलियों तक भी ले जाया जाता था।
रामलीला में हिंदू-मुस्लिम दोनों की भागीदारी
पुरानी दिल्ली की रामलीला भी साझा संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। रामायण की कथा पर आधारित इस नाट्य आयोजन में शहर के अलग-अलग समुदायों के लोग शामिल होते थे। दिल्ली की पहली रामलीला समिति की स्थापना बहादुर शाह जफर के समय से जोड़ी जाती है। यह परंपरा आज भी दिल्ली की ऐतिहासिक रामलीला संस्कृति के संदर्भ में याद की जाती है।
अठारहवीं सदी के फारसी लेखक मिर्जा कातिल ने अपनी पुस्तक ‘हफ्त तमाशा’ में दशहरा और रामलीला के आयोजनों का वर्णन किया है। उनके अनुसार, हिंदू और मुसलमान दोनों इन उत्सवों में उत्साह से हिस्सा लेते थे। दिल्ली के बाजारों और चौकों में रावण के बड़े-बड़े पुतले बनाए जाते थे। रावण के पेट में मिट्टी का एक बर्तन रखा जाता था, जिसमें शरबत भरा होता था। राम का रूप धारण किए बच्चे उस बर्तन पर तीर चलाते थे। इसके टूटने पर शरबत बाहर निकलता और लोग इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानते थे।
इस अवसर पर मिट्टी के कुल्हड़ों में शरबत भी बांटा जाता था। यमुना के किनारे बड़ा मेला लगता था, जिसमें दूर-दूर से लोग पहुंचते थे। नवरात्र के दौरान छोटी नावों में जौ बोया जाता था। दशहरे के दिन लोग जौ की हरी बालियां अपनी पगड़ी, टोपी और कानों पर लगाते थे। इसे शुभ माना जाता था।
रामलीला के मंचन में भी फारसी और उर्दू का इस्तेमाल होता था। उस समय फारसी दरबार की भाषा थी और बड़ी संख्या में लोग इसे समझते थे। तुलसीदास की रामायण के चौपाइयों का फारसी में पाठ किया जाता था। राम, सीता, लक्ष्मण और रावण के पात्रों को रथों पर बैठाकर जुलूस निकाले जाते थे। राम के वनवास के प्रसंग में नाव के जरिए उन्हें प्रतीकात्मक गंगा पार कराई जाती थी। इस आयोजन को देखने के लिए हिंदू और मुसलमान, अमीर और गरीब, महिलाएं और पुरुष बड़ी संख्या में जुटते थे।
साझा विरासत की याद दिलाता है इतिहास
मुगलकालीन दिवाली, दशहरा और रामलीला के ये विवरण बताते हैं कि भारत की सांस्कृतिक पहचान हमेशा से विविध परंपराओं के मेल से बनी है। मुगल शासकों ने स्थानीय रीति-रिवाजों को अपनाया और कई अवसरों पर उन्हें शाही संरक्षण भी दिया। स्थानीय समाज ने भी दरबार की कुछ परंपराओं और सांस्कृतिक प्रभावों को अपने जीवन में जगह दी।
यह इतिहास हर बादशाह या हर दौर को एक जैसा नहीं बताता। धार्मिक नीतियों में अंतर और समय के साथ बदलाव भी रहे। फिर भी पुराने दस्तावेज, चित्र और इतिहासकारों के विवरण यह दिखाते हैं कि त्योहारों के अवसर पर सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल की मजबूत परंपरा मौजूद थी।
आज जब दिवाली देशभर में रोशनी और खुशियों के साथ मनाई जाती है, तब ‘जश्न-ए-चरागां’ की यह कहानी याद दिलाती है कि त्योहारों की खूबसूरती केवल धार्मिक रस्मों में नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने की उनकी क्षमता में भी है। रोशनी के ये दीप सदियों से घरों के साथ-साथ साझा संस्कृति और आपसी सद्भाव की राह भी रोशन करते रहे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. मुगलकाल में दिवाली को किस नाम से जाना जाता था?
मुगलकाल में दिवाली को ‘जश्न-ए-चरागां’ कहा जाता था। इसका अर्थ है रोशनी का उत्सव।
2. किस मुगल बादशाह ने अपने दरबार में दिवाली मनाने की परंपरा को बढ़ावा दिया?
अकबर के शासनकाल में मुगल दरबार में दिवाली उत्सव को विशेष महत्व मिला। उनके बाद शाहजहां और कई अन्य मुगल शासकों ने भी इस परंपरा को जारी रखा।
3. मोहम्मद शाह रंगीला के समय दिवाली कैसे मनाई जाती थी?
लाल किले के रंग महल को दीयों से सजाया जाता था। आतिशबाजी होती थी और आकाश दीया जलाया जाता था। बादशाह को सोने और चांदी से तौलकर गरीबों में धन बांटने का भी उल्लेख मिलता है।
4. ‘रंगीला की दिवाली’ किसे कहा जाता था?
मोहम्मद शाह रंगीला के शाही काफिले के साथ चांदनी चौक जाने की परंपरा के कारण वहां के दिवाली उत्सव को ‘रंगीला की दिवाली’ कहा जाने लगा।
5. क्या मुगलकाल में दशहरा और रामलीला भी मनाई जाती थी?
हां। ऐतिहासिक विवरणों में मुगलकालीन दिल्ली में दशहरा और रामलीला के आयोजन का उल्लेख मिलता है। इन आयोजनों में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होते थे।
6. मुगलकालीन रामलीला में कौन सी भाषाएं इस्तेमाल होती थीं?
फारसी और उर्दू में रामायण के प्रसंगों का पाठ और आयोजन से जुड़ी रचनाएं प्रस्तुत की जाती थीं। फारसी उस समय दरबार की प्रमुख भाषा थी।

