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श्रीनगर में ‘नुज़ूल-ए-कुरआन कॉन्फ्रेंस’, जम्मू-कश्मीर के उलेमा और सूफी मशायख ने कुरआन के संदेश पर दिया ज़ोर

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, श्रीनगर

कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में कुरआन के अवतरण (नुज़ूल-ए-कुरआन) की अहमियत और उसके आध्यात्मिक संदेश को समझाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण धार्मिक सम्मेलन आयोजित किया गया। अंजुमन उलेमा-ए-अहनाफ़ जम्मू-कश्मीर की ओर से आयोजित इस एक दिवसीय “नुज़ूल-ए-कुरआन कॉन्फ्रेंस” में प्रदेश के प्रतिष्ठित उलेमा, सूफी मशायख, दरगाहों और खानकाहों के सज्जादा नशीन तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

यह सम्मेलन श्रीनगर के एक स्थानीय होटल में आयोजित किया गया, जिसमें कश्मीर के धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़े कई प्रमुख व्यक्तित्व मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ इस्लामी विद्वान सैयद इफ्तिखार अहमद कामली ने की, जबकि सम्मेलन के आयोजन में अंजुमन उलेमा-ए-अहनाफ़ के प्रमुख पीरज़ादा मौलाना अख़्तर हुसैन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कुरआन की तिलावत से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

सम्मेलन की शुरुआत क़ारी बिलाल द्वारा कुरआन की तिलावत से हुई। उनकी आवाज़ में पढ़ी गई आयतों ने पूरे सभागार में आध्यात्मिक वातावरण पैदा कर दिया। इसके बाद कश्मीर के प्रसिद्ध नातगो कवि और नातख़्वां ग़ुलाम हसन ग़मगीन ने अपनी विशिष्ट शैली में नात-ए-रसूल पेश की, जिसे उपस्थित लोगों ने बड़े ध्यान और श्रद्धा के साथ सुना।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. सैयद शम्सुर्रहमान ने किया, जिन्होंने पूरे सम्मेलन को व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाया और वक्ताओं का परिचय कराया।

उलेमा ने कुरआन के संदेश पर डाला प्रकाश

सम्मेलन में कई प्रमुख उलेमा और धार्मिक विद्वानों ने नुज़ूल-ए-कुरआन के महत्व और कुरआन की शिक्षाओं पर विस्तृत विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि कुरआन केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है।

इस अवसर पर जिन प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार रखे, उनमें मोहम्मद अशरफ इनायती, प्रोफेसर सैयद तैय्यब कामली, मौलाना खुर्शीद अहमद कानूनगो, मौलाना शौकत हुसैन किंग और सैयद इफ्तिखार अहमद कामली शामिल थे।

वक्ताओं ने कहा कि कुरआन का अवतरण मानवता के लिए एक महान घटना है, जिसने समाज को न्याय, करुणा, भाईचारे और इंसाफ का संदेश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में कुरआन की शिक्षाओं को समझना और उन्हें अपने जीवन में लागू करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।

समाज में शांति और भाईचारे का संदेश

अपने संबोधनों में उलेमा ने इस बात पर जोर दिया कि कुरआन की मूल शिक्षा इंसानियत, शांति और आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि इस्लाम का वास्तविक संदेश समाज में सद्भाव और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना है।

वक्ताओं ने युवाओं को विशेष रूप से संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें कुरआन की शिक्षाओं को समझना चाहिए और अपने जीवन में ईमानदारी, न्याय और मानवता के सिद्धांतों को अपनाना चाहिए।

मीरवाइज कश्मीर का संदेश भी पढ़ा गया

इस सम्मेलन के दौरान मीरवाइज कश्मीर का एक लिखित संदेश भी पढ़कर सुनाया गया, जिसमें उन्होंने कुरआन की शिक्षाओं को समाज में फैलाने और धार्मिक मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने अपने संदेश में कहा कि इस तरह के कार्यक्रम लोगों को धार्मिक ज्ञान से जोड़ने और समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दिल्ली से दुआई संदेश

दिल्ली की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के इमाम और खतीब डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम ने भी इस सम्मेलन में टेलीफोन के माध्यम से लाइव जुड़कर अपने दुआई शब्द प्रस्तुत किए। उन्होंने सम्मेलन के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम लोगों को कुरआन की शिक्षाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं।

आयोजकों ने किया स्वागत

अंजुमन उलेमा-ए-अहनाफ़ जम्मू-कश्मीर के प्रमुख मौलाना पीरज़ादा अख़्तर हुसैन ने सम्मेलन के दौरान स्वागत भाषण देते हुए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम समाज में जागरूकता बढ़ाने और कुरआन के संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए बेहद जरूरी हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर की सूफी परंपरा हमेशा से प्रेम, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता की प्रतीक रही है और इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे आयोजनों की अहम भूमिका है।

सम्मेलन के अंत में हुआ सम्मान समारोह

कार्यक्रम के समापन पर एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें कई प्रमुख व्यक्तित्वों की दस्तारबंदी की गई। इस अवसर पर सूफी मीडिया सर्विसेज के निदेशक और खिदमतगार-ए-फुकरा पीरज़ादा मंजूर ज़हूर शाह चिश्ती सहित कई अन्य हस्तियों को सम्मानित किया गया।

इस सम्मान समारोह का उद्देश्य धार्मिक और सामाजिक सेवाओं में योगदान देने वाले लोगों को प्रोत्साहित करना था।

कश्मीर की सूफी परंपरा की झलक

इस पूरे सम्मेलन में कश्मीर की समृद्ध सूफी और आध्यात्मिक परंपरा की झलक देखने को मिली। दरगाहों, खानकाहों और आस्तानों से जुड़े खिदमतगारों और श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी ने कार्यक्रम को विशेष महत्व दिया।

सम्मेलन के अंत में सामूहिक दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ और आयोजकों ने उम्मीद जताई कि इस तरह के आयोजन भविष्य में भी जारी रहेंगे, ताकि कुरआन के संदेश को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाया जा सके।