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मथुरा-काशी की मस्जिदें देने से भी नहीं आएगी शांति: मौलाना महमूद मदनी

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने मथुरा और काशी के विवाद पर अपनी स्पष्ट और दो-टूक राय रखते हुए कहा है कि “अगर मथुरा और काशी की मस्जिदें भी सौंप दी जाएँ, तब भी शांति स्थापित नहीं होगी। दस साल बाद कोई और आएगा और नई माँग रख देगा। इसलिए इन मस्जिदों को किसी भी कीमत पर नहीं दिया जा सकता।”

यह बात उन्होंने द वायर की वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा ख़ानम से एक बातचीत के दौरान कही। इंटरव्यू का यह हिस्सा इन दिनों सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है।

बातचीत के दौरान आरफ़ा ख़ानम ने सवाल उठाया कि जब बाबरी मस्जिद हिंदुओं को सौंप दी गई, और देश में मुसलमानों की लाखों मस्जिदें हैं, तो मथुरा और काशी को देने में क्या आपत्ति है? इसके जवाब में मौलाना मदनी ने उल्टा सवाल किया— “इससे होगा क्या?”

आरफ़ा ने कहा कि इससे देश में शांति आएगी। इस पर मौलाना मदनी भावुक हो गए और व्यंग्यात्मक अंदाज़ में बोले— “वाह, वाह! अगर ऐसा हो जाए तो मैं आपकी बात मान लूँ।”
उन्होंने आगे इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि मथुरा में स्थानीय स्तर पर हुए समझौते के बाद काशी की ईदगाह का एक बड़ा हिस्सा श्रीकृष्ण जन्मभूमि को दिया गया था, जिस पर हाईकोर्ट की मुहर भी लगी। लेकिन इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ, बल्कि फिर से शुरू हो गया।

जब उनसे पूछा गया कि क्या वे इस दिशा में कोई पहल करेंगे, तो मौलाना मदनी ने साफ़ कहा— “मैं कौन होता हूँ? या मेरा संगठन कौन होता है? मेरी बात क्यों मानी जाएगी? यही तर्क आरएसएस भी देता है।”

इस दौरान आरफ़ा ख़ानम ने यह टिप्पणी भी की कि मथुरा की मस्जिद आधी मंदिर जैसी दिखाई देती है। इस पर मौलाना मदनी ने कहा कि ऐसी बहसों में उलझने के बजाय आधुनिक कानून और संविधान के दायरे में रहकर समाधान खोजा जाना चाहिए। सभी संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए और मीडिया को भी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए।

भारत में इस्लाम को लेकर बहसें लगातार होती रहती हैं, लेकिन अक्सर उनमें शोर ज़्यादा और समझ कम होती है। इस बातचीत में आरफ़ा ख़ानम ने वे सवाल उठाए, जो आम लोगों के मन में होते हैं, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में कम सुनाई देते हैं।

इस चर्चा के प्रमुख विषय रहे—

  • जिहाद का वास्तविक अर्थ और उसका संदर्भ
  • मुसलमान, राष्ट्र और नागरिकता
  • धर्म की गलत व्याख्या और उसके दुष्परिणाम
  • कट्टरता बनाम सामाजिक सहअस्तित्व
  • भारतीय मुसलमानों की चुनौतियाँ
  • धर्म और राजनीति के बीच का अंतर
  • संवाद, समझ और जिम्मेदारी की आवश्यकता

यह बातचीत