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क्या शादी के बदलते आर्थिक मापदंड ने मुस्लिम युवाओं के लिए निकाह मुश्किल बना दिया है?

भारतीय मुस्लिम समाज में सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक परामर्श के नजरिए से एक पड़ताल

अब्दुलअज़ीम रहमानी मलिकापुरी, फैमिली काउंसलर

भारतीय मुस्लिम समाज में पिछले दो दशकों के दौरान विवाह को लेकर सोच और प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। माता-पिता अपनी बेटियों के सुरक्षित और बेहतर भविष्य की चिंता करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन कई जगहों पर विवाह के लिए नौकरी, वेतन और आर्थिक हैसियत सबसे महत्वपूर्ण कसौटी बनती जा रही है। इसके चलते दीनदारी, अच्छे संस्कार, चरित्र, जिम्मेदारी और पारिवारिक व्यवहार जैसे महत्वपूर्ण पहलू पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं।

फैमिली काउंसलिंग के अनुभव बताते हैं कि बड़ी संख्या में ऐसे युवा हैं जो शिक्षित, मेहनती, जिम्मेदार और अच्छे चरित्र वाले हैं, लेकिन केवल इसलिए अच्छे रिश्ते नहीं मिल पाते क्योंकि उनकी आमदनी परिवार की अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं है।

कुछ परिवार सरकारी नौकरी को निजी नौकरी, कारोबार, तकनीकी हुनर या स्वरोजगार की तुलना में कहीं अधिक महत्व देते हैं। सरकारी नौकरी को स्थिरता और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र में काम करने वाले, अपना कारोबार करने वाले या हुनर के आधार पर कमाने वाले युवाओं को कई बार कमतर समझ लिया जाता है।

इस सोच का असर युवाओं की शादी की उम्र पर भी पड़ रहा है। कई युवक बेहतर नौकरी, अधिक वेतन या आर्थिक स्थिरता हासिल होने तक निकाह टालते रहते हैं। इससे निकाह में देरी, मानसिक तनाव और सामाजिक एवं भावनात्मक दबाव बढ़ सकता है।

महंगाई ने बढ़ाई दोहरी आय की उम्मीद

बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन के लगातार बढ़ते खर्च ने परिवारों की आर्थिक चिंताएं भी बढ़ाई हैं। इसी वजह से कुछ परिवारों में पति-पत्नी दोनों के कमाने की अपेक्षा मजबूत हुई है। कई जगहों पर लड़की की नौकरी भले ही औपचारिक शर्त न हो, लेकिन रिश्ता तय करते समय यह एक तरह की अनकही अपेक्षा बन जाती है।

परिवार के आर्थिक भविष्य की योजना बनाना निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आर्थिक स्थिति को किसी व्यक्ति के चरित्र, ईमानदारी, जिम्मेदारी और अच्छे व्यवहार से ऊपर रखा जाना चाहिए?

जब किसी युवक की वर्तमान आय को ही उसके पूरे व्यक्तित्व और भविष्य की क्षमता का पैमाना मान लिया जाता है, तब विवाह का उद्देश्य कहीं न कहीं प्रभावित होने लगता है।

इस्लाम में निकाह का आधार क्या है?

इस्लामी शिक्षाओं में विवाह को केवल आर्थिक समझौते के रूप में नहीं देखा गया है। निकाह के लिए दीनदारी, अच्छे अखलाक, ईमानदारी, जिम्मेदारी और आपसी अनुकूलता जैसे गुणों को महत्वपूर्ण माना गया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक क्षमता का कोई महत्व नहीं है। परिवार चलाने के लिए बुनियादी आर्थिक जिम्मेदारी निभाने की क्षमता निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन अनावश्यक आर्थिक अपेक्षाओं और सामाजिक दिखावे के कारण निकाह को इतना कठिन बना देना कि योग्य युवक और युवती विवाह से दूर होते जाएं, इस्लामी सादगी और संतुलन की भावना से मेल नहीं खाता।

इस्लाम मेहनत, हलाल कमाई, आत्मनिर्भरता और लगातार बेहतर करने की कोशिश को प्रोत्साहित करता है। इसलिए किसी युवक की केवल आज की आय देखने के बजाय उसके चरित्र, मेहनत, जिम्मेदारी और आगे बढ़ने की क्षमता को भी देखा जाना चाहिए।

क्या सरकारी नौकरी ही सफलता की गारंटी है?

समाज में सरकारी नौकरी को लेकर एक विशेष आकर्षण लंबे समय से रहा है। नौकरी की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा इसके पीछे बड़ी वजह हैं। लेकिन आज रोजगार की दुनिया काफी बदल चुकी है।

निजी क्षेत्र, व्यापार, स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, तकनीकी व्यवसाय और विभिन्न प्रकार के हुनर युवाओं के लिए आय के नए रास्ते खोल रहे हैं। ऐसे में केवल नौकरी के प्रकार के आधार पर किसी व्यक्ति की योग्यता या भविष्य का फैसला करना उचित नहीं है।

किसी युवक की वर्तमान आमदनी कम हो सकती है, लेकिन उसमें मेहनत, ईमानदारी, जिम्मेदारी और आगे बढ़ने की क्षमता हो सकती है। दूसरी ओर, अधिक वेतन अपने आप में अच्छे चरित्र और सफल वैवाहिक जीवन की गारंटी नहीं देता।

जरूरत है आर्थिक अपेक्षाओं में संतुलन की

मुस्लिम समाज के सामने आज सबसे बड़ी जरूरत संतुलित सोच विकसित करने की है। विवाह के लिए आर्थिक स्थिरता को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता और उसे सबसे बड़ा पैमाना भी नहीं बनाया जाना चाहिए।

रिश्ता तय करते समय युवक की वर्तमान आय के साथ उसके चरित्र, व्यवहार, शिक्षा, मेहनत, पारिवारिक जिम्मेदारी की समझ और भविष्य के प्रति उसके दृष्टिकोण को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

इसी तरह युवतियों और उनके परिवारों की अपेक्षाएं भी वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए। हर परिवार को अपनी आर्थिक स्थिति, जीवनशैली और जरूरतों के अनुसार फैसले लेने का अधिकार है, लेकिन सामाजिक प्रतिस्पर्धा और दिखावे को विवाह की अनिवार्य शर्त बना देना समस्या को और गंभीर कर सकता है।

निकाह को आसान बनाने में काउंसलिंग की भूमिका

प्री मैरिटल काउंसलिंग यानी विवाह पूर्व परामर्श इस समस्या का एक उपयोगी समाधान हो सकता है। विवाह से पहले दोनों पक्षों को आर्थिक स्थिति, भविष्य की योजनाओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों, करियर, रहने की व्यवस्था और आपसी अपेक्षाओं पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए।

इससे कई गलतफहमियां शादी से पहले ही दूर की जा सकती हैं। परिवारों को भी यह समझने में मदद मिल सकती है कि कौन सी अपेक्षाएं वास्तविक हैं और कौन सी केवल सामाजिक दबाव या दिखावे से पैदा हुई हैं।

आखिरकार निकाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध भी है। इसलिए इसमें आर्थिक समझ के साथ भावनात्मक परिपक्वता, आपसी सम्मान और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

समाज को बदलनी होगी सोच

आज जरूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज विवाह के मानदंडों में आर्थिक स्थिति और मानवीय गुणों के बीच संतुलन बनाए। युवक की कमाई को देखा जाए, लेकिन उसके साथ उसका चरित्र भी देखा जाए। उसकी नौकरी को देखा जाए, लेकिन उसकी मेहनत और जिम्मेदारी को भी महत्व मिले। उसकी वर्तमान स्थिति को देखा जाए, लेकिन उसके भविष्य की क्षमता को नजरअंदाज न किया जाए।

यदि परिवार यथार्थवादी अपेक्षाएं रखें, विवाह पूर्व परामर्श को बढ़ावा दिया जाए और सामाजिक दिखावे के बजाय सादगी तथा आपसी समझ को महत्व दिया जाए, तो निकाह को आसान बनाया जा सकता है।

आसान निकाह केवल युवाओं के लिए राहत नहीं होगा, बल्कि इससे परिवार मजबूत होंगे, मानसिक और सामाजिक दबाव कम होगा और समाज में अधिक संतुलित वैवाहिक संबंध विकसित हो सकेंगे।