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वाशिंगटन और तेहरान के बीच ऐतिहासिक डील, 60 दिनों में कैसे संभव हुआ समझौता ?

नई दिल्ली/वाशिंगटन।

अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से चला आ रहा सैन्य और परमाणु तनाव अब खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। दोनों देशों ने हफ्तों की लंबी बातचीत के बाद एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सहमति पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अमेरिकी प्रशासन ने इस समझौते का पूरा मसौदा आधिकारिक तौर पर जारी कर दिया है। इसे मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में शांति स्थापना की दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।

इस शुरुआती समझौते के तहत दोनों पक्ष तुरंत सैन्य दुश्मनी और हमले रोकने पर सहमत हुए हैं। दोनों देशों के पास अब अगले 60 दिनों के भीतर एक परमानेंट और पूरी तरह से लागू होने वाली ‘फाइनल डील’ तैयार करने का समय है। अगर दोनों पक्ष चाहेंगे तो आपसी सहमति से इस समयसीमा को आगे भी बढ़ाया जा सकेगा। यह समझौता सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। इसमें युद्ध विराम, आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, समुद्री रास्तों की सुरक्षा और ईरान के पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर का भारी-भरकम पैकेज भी शामिल है।

युद्ध विराम और सुरक्षा पर सबसे बड़ा फैसला

इस एमओयू की सबसे पहली और महत्वपूर्ण शर्त तत्काल प्रभाव से युद्ध विराम लागू करना है। दोनों देशों ने सभी मोर्चों पर अपनी सैन्य कार्रवाइयों को हमेशा के लिए रोकने का फैसला किया है। इसमें लेबनान का मोर्चा भी शामिल है जहां लंबे समय से हिंसा चल रही थी। नए नियमों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान या उनके सहयोगी देश भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ न तो युद्ध शुरू करेंगे, न ही किसी तरह के सैन्य ऑपरेशन या बल प्रयोग की धमकी देंगे।

दोनों देशों ने साफ किया है कि वे एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का पूरा सम्मान करेंगे। कोई भी देश किसी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा। जब तक अंतिम और पूर्ण समझौता नहीं हो जाता, तब तक वर्तमान स्थिति (स्टेटस को) को बनाए रखा जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार को अभी जहां है वहीं रोक देगा (फ्रीज करेगा)। दूसरी तरफ अमेरिका इस दौरान ईरान पर कोई भी नया आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात करेगा।

हॉरमुज जलडमरू मध्य और समुद्री रास्तों की सुरक्षा

इस ऐतिहासिक समझौते में समुद्री व्यापार और नौसैनिक मोर्चों को लेकर भी बेहद साफ दिशा-निर्देश दिए गए हैं। अमेरिका इस डील के बाद तुरंत ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी (ब्लॉकेड) हटाना शुरू कर देगा। इस नाकेबंदी को अगले 30 दिनों के भीतर पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा।

जवाब में ईरान ने अगले 60 दिनों के लिए हॉरमुज जलडमरू मध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले सभी कमर्शियल जहाजों और व्यापारिक नौकाओं को सुरक्षित और मुफ्त रास्ता देने का भरोसा दिया है। इस समुद्री रास्ते को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने के लिए समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाने (डी-माइनिंग) और तकनीकी मंजूरी का काम अगले 30 दिनों में पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद यहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पहले की तरह सामान्य हो जाएगी। इसके साथ ही ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते के परमानेंट मैनेजमेंट के लिए ओमान और अन्य खाड़ी देशों के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत काम करेगा।

प्रतिबंधों से राहत और $300 अरब का भारी फंड

ईरान को इस समझौते से बहुत बड़ी आर्थिक राहत मिलने जा रही है। अमेरिका ने वादा किया है कि अंतिम समझौते के हिस्से के रूप में वह ईरान पर लगे सभी तरह के प्रतिबंधों को पूरी तरह खत्म कर देगा। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और अमेरिका के एकतरफा प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंध शामिल हैं।

ईरान को तुरंत राहत देने के लिए अमेरिका उसके तेल निर्यात और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे प्रतिबंधों में तत्काल ढील (वेवर) देगा। तेल व्यापार से जुड़ी बैंकिंग, इंश्योरेंस और शिपिंग सेवाओं को भी तुरंत चालू कर दिया जाएगा। इसके अलावा दुनिया भर के बैंकों में फ्रीज (जब्त) पड़े ईरान के अरबों डॉलर के फंड और संपत्तियों को तुरंत रिलीज किया जाएगा ताकि ईरान उनका इस्तेमाल कर सके।

इस समझौते का सबसे चौंकाने वाला और बड़ा हिस्सा ईरान का पुनर्निर्माण प्लान है। अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदार देशों के साथ मिलकर ईरान के आर्थिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा खड़ा करने के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर (300 Billion Dollars) का एक बड़ा सहायता प्लान तैयार करेगा। इस भारी-भरकम निवेश को कैसे लागू किया जाएगा, इसका पूरा ब्लूप्रिंट आने वाले 60 दिनों की बातचीत में तय होगा।

परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का रुख

परमाणु हथियारों को लेकर चल रही दुनिया की चिंता पर भी इस एमओयू में बात की गई है। ईरान ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने यह दोहराया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा।

ईरान के पास अभी जो भी संवर्धित यूरेनियम (Enriched Material) जमा है, उसका निपटारा किया जाएगा। शुरुआती तौर पर इस पूरे स्टॉक को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की कड़ी निगरानी में ईरान के अंदर ही डाउन-ब्लेंड (परमाणु हथियार न बन पाने वाले स्तर पर लाना) किया जाएगा। भविष्य में ईरान किस स्तर तक यूरेनियम संवर्धन कर सकेगा और उसके बाकी परमाणु ठिकानों का क्या होगा, इन सभी तकनीकी मुद्दों पर अंतिम डील में विस्तार से बात होगी।

आने वाले 60 दिन बेहद महत्वपूर्ण

यह पूरा एमओयू असल में एक शॉर्ट-टर्म समझौता और विश्वास बहाली का जरिया है। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच अविश्वास को खत्म करके बातचीत का माहौल बनाना है। ईरान को तुरंत तेल बेचने की आजादी और आर्थिक राहत मिल रही है, जिसके बदले वह लेबनान में युद्ध विराम लागू करवा रहा है और अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखने के लिए एक एग्जीक्यूटिव मॉनिटरिंग मैकेनिज्म (निगरानी तंत्र) बनाया गया है। शुरुआती चरण में जैसे ही युद्ध विराम, नाकेबंदी हटाना, तेल प्रतिबंधों में छूट और फ्रीज फंड रिलीज करने का काम पूरा होगा, दोनों पक्ष बाकी बचे जटिल मुद्दों पर ठंडे दिमाग से बातचीत शुरू कर देंगे। जब 60 दिनों में यह फाइनल डील पूरी हो जाएगी, तो इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक बाध्यकारी प्रस्ताव के जरिए पूरी दुनिया में कानूनी रूप से मान्यता दी जाएगी।

पड़ोसी देशों की चिंताएं अभी भी बरकरार

भले ही यह समझौता बेहद सकारात्मक दिख रहा हो, लेकिन ईरान के पड़ोसी देश अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। जानकारों का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम तो एक समस्या है ही, लेकिन उसका बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम भी क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। इसके अलावा ईरान अपने ‘ प्रॉक्सी’ (सहयोगी संगठनों) के जरिए पड़ोसियों के आंतरिक मामलों में जो दखल देता है, वह भी खाड़ी देशों के लिए बड़ी सिरदर्दी है। अमेरिका के विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक 60 दिनों के भीतर बनने वाली ‘फाइनल डील’ में इन मिसाइलों और प्रॉक्सी नेटवर्क वाले मुद्दे को पूरी तरह से हल नहीं किया जाता, तब तक खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति का सपना अधूरा ही रहेगा। अब पूरी दुनिया की नजरें वाशिंगटन और तेहरान के अगले कदमों पर टिकी हैं।