गाजा योजना पर इजरायल का इनकार, मुस्लिम देशों ने अमेरिका से पूछा सवाल
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, लंदन
गाजा में युद्ध खत्म करने की कोशिश एक बार फिर मुश्किल में पड़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 15 सूत्रीय गाजा शांति योजना को लेकर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रुख ने अरब और मुस्लिम देशों को नाराज कर दिया है। सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, तुर्की, कतर और संयुक्त अरब अमीरात ने इजरायल के रुख की सार्वजनिक रूप से निंदा की है। इन देशों ने अमेरिका से भी कहा है कि वह इजरायल पर योजना लागू करने के लिए दबाव बनाए।
इस घटनाक्रम ने एक पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया है। अगर अमेरिका गाजा में युद्ध खत्म करना चाहता है और अरब तथा इस्लामिक देश भी इसके पक्ष में हैं, तो इजरायल के इनकार के बाद अगला कदम क्या होगा? केवल बयान और निंदा काफी होगी या इजरायल पर वास्तविक कूटनीतिक दबाव डाला जाएगा?
यही सवाल अब गाजा शांति प्रक्रिया के केंद्र में है।
आठ देशों ने इजरायल के रुख की निंदा की
रविवार को आठ देशों के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान जारी किया। इसमें सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, तुर्की, कतर और यूएई शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इजरायल का रुख गाजा में युद्ध समाप्त करने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकता है।
इन देशों ने फिलिस्तीनी राज्य के दर्जे को नकारने या रोकने की किसी भी कोशिश का भी विरोध किया। उनका कहना है कि स्थायी शांति के लिए दो राज्य समाधान जरूरी है।
संयुक्त बयान में यह भी कहा गया कि गाजा में मानवीय सहायता, सुरक्षा, पुनर्निर्माण और राजनीतिक संक्रमण को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी योजना को लागू करना जरूरी है।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें यूएई और सऊदी अरब जैसे अमेरिका के करीबी सहयोगी देश भी शामिल हैं। दोनों देशों के इजरायल और अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल सार्वजनिक निंदा से इजरायल पर असर पड़ेगा।
‼️ An old prophecy says that eventually, the world will turn against Israel — and that the current state of Israel will cease to exist.
— Jack Straw (@JackStr42679640) August 16, 2026
🇹🇷🇶🇦🇪🇬 Turkey, Qatar and Egypt may be forced to take “radical steps” over Gaza — Turkish FM Hakan Fidan.
Fidan says Israel must withdraw from… pic.twitter.com/hKKq3oC3qW
नेतन्याहू ने क्यों ठुकराई योजना?
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप की 15 सूत्रीय योजना को स्वीकार करने से इनकार किया है। उनका कहना है कि इजरायली सेना तब तक गाजा से पीछे नहीं हटेगी जब तक हमास का पूर्ण निरस्त्रीकरण नहीं हो जाता।
यहीं से अमेरिका, इजरायल और हमास के बीच सबसे बड़ा मतभेद सामने आता है।
अमेरिकी योजना में हमास के निरस्त्रीकरण के साथ इजरायली सेना की वापसी, अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बल की तैनाती और गाजा के प्रशासन को एक नए फिलिस्तीनी ढांचे में ले जाने की बात शामिल है। योजना में गाजा के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी प्रस्तावित है।
हमास ने योजना पर सशर्त रुख अपनाया है। संगठन का कहना है कि इजरायल को पहले अपनी सैन्य कार्रवाई रोकनी होगी और सेना को निर्धारित सीमा तक पीछे हटना होगा। इसके बाद निरस्त्रीकरण और योजना के अगले चरण पर बातचीत आगे बढ़ सकती है।
इस तरह दोनों पक्ष एक दूसरे से पहले कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।
हमास ने Board of Peace से क्या कहा?
इसी बीच हमास ने अमेरिका समर्थित Board of Peace और मध्यस्थ देशों से इजरायल को योजना स्वीकार करने के लिए दबाव डालने की मांग की है।
रविवार को हमास नेता खलील अल हय्या और अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत जेरेड कुशनर के बीच मिस्र में मुलाकात हुई। यह मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि कुशनर गाजा योजना को आगे बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय मध्यस्थों के साथ बातचीत कर रहे हैं।
हमास ने मध्यस्थों से कहा कि इजरायल को पहले चरण में किए गए दायित्व पूरे करने चाहिए। इनमें हमले रोकना, उल्लंघनों को समाप्त करना और गाजा में सैन्य गतिविधियों को कम करना शामिल है।
हमास का कहना है कि यदि इजरायल अपनी जिम्मेदारियां पूरी करता है तो योजना के दूसरे चरण की ओर बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।
Statement | The Ministry of Foreign Affairs of the State of Qatar and 7 Arab and Islamic countries condemn the declared Israeli rejection of the Road Map for completing the implementation of US President Trump’s Comprehensive Plan to End the Gaza conflict
— Ministry of Foreign Affairs – Qatar (@MofaQatar_EN) August 16, 2026
Doha | 16 August 2026… pic.twitter.com/fKOKHlwvJ0
कुशनर की नेतन्याहू से मुलाकात अहम
जेरेड कुशनर की कूटनीतिक कोशिश का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव इजरायल है। वह नेतन्याहू से मुलाकात कर सकते हैं। बातचीत का मुख्य मुद्दा यही होगा कि इजरायल गाजा शांति योजना को किस तरह स्वीकार कर सकता है।
अमेरिका के सामने मुश्किल यह है कि वह हमास के निरस्त्रीकरण की मांग को भी आगे बढ़ाना चाहता है और इजरायल से सैन्य वापसी तथा युद्ध समाप्त करने की प्रतिबद्धता भी चाहता है।
अगर दोनों पक्ष अपनी शुरुआती शर्तों पर अड़े रहते हैं तो योजना का अगला चरण शुरू करना आसान नहीं होगा।
मुस्लिम देशों की निंदा के बाद असली सवाल
आठ देशों का बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है। लेकिन इसके बाद असली सवाल कार्रवाई का है।
सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अमेरिका के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। मिस्र और कतर गाजा संघर्ष में लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। तुर्की भी फिलिस्तीन के मुद्दे पर सक्रिय है। पाकिस्तान और इंडोनेशिया ने भी फिलिस्तीनी राज्य के समर्थन में अपना रुख स्पष्ट किया है।
इन देशों के पास अलग अलग स्तर पर आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव है। लेकिन अभी तक उनकी रणनीति मुख्य रूप से बातचीत, मध्यस्थता और सार्वजनिक दबाव तक सीमित दिखाई देती है।
यही वजह है कि गाजा में इजरायल के रुख को लेकर सवाल लगातार बढ़ रहा है।
क्या अमेरिका अपने सहयोगी इजरायल पर उतना दबाव डालेगा जितना वह हमास के निरस्त्रीकरण के लिए डाल रहा है?
क्या अरब और मुस्लिम देश अपने बयान से आगे जाकर कोई संयुक्त कदम उठाएंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या गाजा में स्थायी युद्धविराम के लिए दोनों पक्षों पर एक समान दबाव बनाया जाएगा?
दो राज्य समाधान पर जोर
आठ देशों ने अपने संयुक्त बयान में दो राज्य समाधान का समर्थन दोहराया है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रासंगिक प्रस्तावों के अनुरूप एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य ही स्थायी शांति का आधार बन सकता है।
इन देशों ने 1967 से पहले की सीमाओं और पूर्वी यरुशलम को फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी बनाने की स्थिति का समर्थन किया है।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गाजा युद्ध को केवल सुरक्षा के सवाल तक सीमित करने पर फिलिस्तीनी राज्य का प्रश्न पीछे छूट सकता है।
अरब देशों का कहना है कि गाजा में युद्ध रोकना जरूरी है, लेकिन इसके साथ फिलिस्तीनी राजनीतिक अधिकारों का समाधान भी होना चाहिए।
गाजा के पुनर्निर्माण की चुनौती
गाजा युद्ध ने बड़े पैमाने पर तबाही छोड़ी है। इसलिए किसी भी शांति योजना की सफलता केवल युद्ध रोकने से तय नहीं होगी।
अस्पतालों, स्कूलों, घरों और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण की जरूरत होगी। लाखों लोगों के जीवन को सामान्य स्थिति में लाना होगा। मानवीय सहायता की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।
ट्रंप की योजना में गाजा के प्रशासन और पुनर्निर्माण के लिए नया ढांचा बनाने की बात है। अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बल की संभावित भूमिका भी इसमें शामिल है।
लेकिन इसके लिए सबसे पहले सुरक्षा व्यवस्था पर सहमति जरूरी है।
क्या अमेरिका इजरायल पर दबाव डालेगा?
गाजा शांति योजना की सफलता अब काफी हद तक वाशिंगटन की भूमिका पर निर्भर करती दिखाई दे रही है।
अमेरिका अगर इजरायल और हमास दोनों से योजना की शर्तें लागू कराने में सफल होता है तो युद्धविराम को आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन अगर किसी एक पक्ष को ज्यादा छूट मिलती है तो पूरी प्रक्रिया फिर रुक सकती है।
मुस्लिम देशों का संयुक्त बयान इसी चिंता को सामने लाता है। उन्होंने अमेरिका से आग्रह किया है कि वह इजरायल के साथ लगातार संपर्क बनाए रखे और यह सुनिश्चित करे कि योजना के तहत किए गए वादों का पालन हो।
फिलहाल गेंद अमेरिका के पाले में है।
कुशनर की बातचीत, नेतन्याहू का रुख और हमास की शर्तें आने वाले दिनों की दिशा तय करेंगी। गाजा में शांति की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन यह साफ है कि केवल एक योजना बन जाने से युद्ध खत्म नहीं होगा।
इसके लिए अमेरिका को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना होगा। इजरायल को भी समझौते के लिए तैयार होना होगा। हमास को भी निरस्त्रीकरण की शर्त पर आगे बढ़ना होगा। और अरब तथा मुस्लिम देशों को केवल बयान जारी करने के बजाय अपनी कूटनीतिक भूमिका को और प्रभावी बनाना होगा।
गाजा के लोगों के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कागज पर बनी शांति योजना जमीन पर कब दिखाई देगी।

