असम बाढ़ में जमीयत की राहत ने दी नफरत को करारी मात
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, गुवहाटी
असम की वादियों में इस वक्त राजनीति और इंसानियत के बीच एक बड़ी जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ जहां राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बंगाली भाषी मुसलमानों को लेकर तल्ख तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीयत उलमा-ए-हिंद ने जमीन पर उतरकर सेवा की एक नई मिसाल पेश कर दी है। जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने साफ कर दिया है कि आपदा के वक्त इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म होती है।

राहत कार्यों का पहला चरण पूरा
संगठन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए 3 करोड़ 43 लाख रुपये के बड़े राहत और पुनर्वास कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। इसका पहला चरण सफलता के साथ पूरा हो चुका है। राज्य के छह अलग-अलग जिलों के करीब 1,565 प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में सीधे तौर पर 1 करोड़ 35 लाख रुपये ट्रांसफर किए जा चुके हैं। संगठन का दावा है कि बची हुई पूरी रकम भी अगले एक हफ्ते के भीतर पीड़ितों के खातों में पहुंच जाएगी।
असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए जमीयत उलमा-ए-हिंद के 3 करोड़ 43 लाख रुपये के राहत एवं पुनर्वास कार्यक्रम का पहला चरण पूरा हो चुका है। असम के छह जिलों के 1,565 प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में 1 करोड़ 35 लाख रुपये सीधे स्थानांतरित किए जा चुके हैं। इंशाअल्लाह, आगामी एक सप्ताह के भीतर पूरी राशि बाढ़ पीड़ितों के बैंक खातों में भेजी दी जाएगी। इस पूरी मुहिम की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि राहत पाने वालों में बड़ी संख्या हमारे हम वतन भाई-बहनों की है। जमीयत उलमा-ए-हिंद किसी मुसीबतज़दा व्यक्ति का धर्म, नाम, जाति या पहनावा नहीं देखती हमारे सामने केवल उसकी मुसीबत, जरूरत और इंसानियत होती है। जो लोग मुसलमानों को मुसलमान कहने के बजाय ‘मियां’ कहकर संबोधित करते हैं और इंसानों को उनके कपड़ों से पहचानने की बात करते हैं, उन्हें असम में जमीयत उलमा-ए-हिंद की इस सेवा-ए-इंसानियत से सबक लेना चाहिए। हम इंसान को उसके धर्म या पहचान से नहीं, बल्कि उसकी जरूरत से पहचानते हैं। सांप्रदायिकता इंसानों के बीच दीवारें खड़ी करती है, जबकि सेवा-ए-इंसानियत उन्हीं दीवारों को गिराकर दिलों को जोड़ती है। भारत की ताकत नफरत और विभाजन में नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे, एकता और सद्भाव में है। नफरत का सबसे प्रभावी जवाब सेवा है, और असम के बाढ़ पीड़ितों के बीच जमीयत उलमा-ए-हिंद की यह मुहिम इसी सिद्धांत का वास्तविक उदाहरण है। Full Video this link 👇 https://t.co/ZElfGYaFUK #ArshadMadani #AssamFloodRelief #HumanityFirst #ServingHumanity
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) September 26, 2026
सियासत से दूर सिर्फ इंसानियत की फिक्र
इस पूरी राहत मुहिम की सबसे खास बात यह रही कि मदद पाने वालों में सिर्फ एक खास वर्ग के लोग नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में हमारे अन्य हमवतन भाई-बहन भी शामिल हैं। जमीयत ने किसी भी पीड़ित की जाति, उसका धर्म या उसका पहनावा देखे बिना सिर्फ उसकी मजबूरी और जरूरत को प्राथमिकता दी है। संगठन का मानना है कि मुश्किल वक्त में इंसान की पहचान सिर्फ उसकी तकलीफ होती है, न कि उसका मजहब।
मुख्यमंत्री के बयानों पर तीखा पलटवार
हाल ही में असम के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान दिया था कि बंगाली मुसलमानों या ‘मियां’ कहे जाने वाले तबके को परेशान किया जाना चाहिए। यहां तक कि उन्होंने लोगों से अपील की थी कि यदि वे रिक्शा चलाएं तो उन्हें पूरा किराया देने के बजाय कम पैसे दिए जाएं, ताकि वे खुद राज्य छोड़कर चले जाएं। इस तरह के बयानों ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
इन बयानों पर तीखा वार करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि जो लोग समाज में नफरत की दीवारें खड़े करते हैं और इंसानों को उनके कपड़ों या पहचान से आंकते हैं, उन्हें इस सेवा कार्य से सीख लेनी चाहिए। उनका कहना है कि नफरत का सबसे सटीक और प्रभावी जवाब सिर्फ और सिर्फ जनसेवा है। देश की असली ताकत भाईचारे और आपसी सद्भाव में बसती है, न कि लोगों को बांटने में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: जमीयत उलमा-ए-हिंद ने असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए कितने बजट की घोषणा की है? उत्तर: जमीयत उलमा-ए-हिंद ने असम बाढ़ पीड़ितों के राहत और पुनर्वास के लिए कुल 3 करोड़ 43 लाख रुपये के पैकेज की घोषणा की है।
प्रश्न 2: राहत राशि का वितरण किस प्रकार किया जा रहा है? उत्तर: पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सहायता राशि सीधे प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में ट्रांसफर (डीबीटी) की जा रही है।
प्रश्न 3: जमीयत के राहत अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है? उत्तर: बिना किसी धार्मिक, जातीय या पहनावे के भेदभाव के सभी बाढ़ पीड़ितों तक त्वरित मानवीय सहायता पहुंचाना और सामाजिक भाईचारे को मजबूत करना है।
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