PoliticsTOP STORIES

राजस्थान राज्यसभा चुनाव में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर बढ़ता दबाव और सियासी हलचल

राजस्थान की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों और सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवालों के बीच खड़ी नजर आ रही है। जून 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनावों से पहले प्रदेश का मुस्लिम समुदाय, खासतौर पर कायमखानी बिरादरी, कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाने की रणनीति में जुट गया है। इस बार की मांग साफ है—राजस्थान से ही किसी मुस्लिम चेहरे को राज्यसभा भेजा जाए, न कि बाहरी उम्मीदवार को।

प्रदेश के वरिष्ठ बुद्धिजीवी, पूर्व ब्यूरोक्रेट्स और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव शब्बीर खान इस मुद्दे को मजबूती से उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि राजस्थान के मुस्लिम समाज, जो लंबे समय से कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा है, को अब केवल वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मिलना चाहिए।

राज्यसभा चुनाव का गणित और सियासी मजबूरी

राजस्थान से राज्यसभा की कुल 10 सीटें हैं, जिनमें से तीन सदस्य जून 2026 में रिटायर हो रहे हैं। इनमें कांग्रेस के नीरज डांगी और भाजपा के राजेंद्र गहलोत व रवनीत सिंह शामिल हैं। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए यह लगभग तय है कि दो सीटें भाजपा और एक सीट कांग्रेस के खाते में जाएगी।

यही एक सीट अब कांग्रेस के लिए राजनीतिक और सामाजिक संतुलन का केंद्र बन गई है। वर्तमान में कांग्रेस के राज्यसभा सांसदों में रणदीप सुरजेवाला, मुकुल वासनिक, प्रमोद कुमार शर्मा और सोनिया गांधी जैसे नाम शामिल हैं, जो राजस्थान से नहीं हैं। नीरज डांगी के रिटायर होने के बाद यदि फिर से बाहरी उम्मीदवार को भेजा जाता है, तो पार्टी के लिए यह एक नकारात्मक राजनीतिक संदेश बन सकता है।

मुस्लिम समुदाय में बढ़ती नाराजगी

राजस्थान में करीब 12 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, लेकिन लंबे समय से उन्हें कांग्रेस संगठन और सत्ता संरचना में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। यही कारण है कि अब यह असंतोष धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगा है।

समुदाय के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि कांग्रेस केवल चुनाव के समय उनके वोटों पर निर्भर रहती है, लेकिन नेतृत्व और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उन्हें शामिल नहीं करती। यदि इस बार भी उनकी अनदेखी होती है, तो यह वर्ग विकल्प तलाशने के लिए मजबूर हो सकता है।

कायमखानी बिरादरी की सक्रियता

कायमखानी बिरादरी, जो राजस्थान में प्रशासनिक सेवाओं और सेना में मजबूत उपस्थिति रखती है, इस बार अपने प्रतिनिधित्व को लेकर बेहद सक्रिय है। इस बिरादरी का मानना है कि उनकी सामाजिक और राष्ट्रीय सेवाओं के योगदान को देखते हुए उन्हें राज्यसभा में स्थान मिलना चाहिए।

इतिहास पर नजर डालें तो कायमखानी समाज से जुड़े कैप्टन अय्यूब खान 1984 और 1991 में झुंझुनूं से लोकसभा सांसद रहे और केंद्र में मंत्री भी बने। इसके बावजूद लंबे समय से इस बिरादरी को राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ा राजनीतिक अवसर नहीं मिला है।

कांग्रेस का पिछला रिकॉर्ड और मुस्लिम प्रतिनिधित्व

राजस्थान से कांग्रेस और भाजपा दोनों ने समय-समय पर मुस्लिम नेताओं को राज्यसभा भेजा है। कांग्रेस ने असरारुल हक, बरकतउल्ला खान, उस्मान आरिफ, अबरार अहमद और अश्क अली टांक जैसे नेताओं को राज्यसभा में भेजा। वहीं भाजपा ने नजमा हेपतुल्ला को यह मौका दिया।

हालांकि, पिछले कई वर्षों से कांग्रेस ने मुस्लिम चेहरों को राज्यसभा में जगह नहीं दी है, जिसे पार्टी की अंदरूनी राजनीति और गुटबाजी का परिणाम माना जा रहा है।

विधानसभा चुनाव 2023 का विश्लेषण

2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 15 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, लेकिन केवल चार ही जीत हासिल कर सके। इनमें हाकम अली खान, जाकिर गैसावत, आमीन कागजी और रफीक खान शामिल हैं।

मेव, सिंधी, व्यापारी और अन्य बिरादरियों से उतारे गए उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। इससे यह भी संकेत मिलता है कि केवल टिकट देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरण और स्थानीय समर्थन भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

निर्दलीय मुस्लिम नेता का उभार

भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर यूनुस खान ने डीडवाना से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की। वह राजस्थान के इतिहास में एकमात्र मुस्लिम निर्दलीय विधायक बने। यह घटना भी इस बात का संकेत है कि यदि मुख्य दल अवसर नहीं देंगे, तो नेता वैकल्पिक रास्ते अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे।

कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती

राज्यसभा उम्मीदवार के चयन में प्रदेश स्तर पर अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद डोटासरा और टीकाराम जूली की भूमिका अहम होगी, जबकि अंतिम निर्णय दिल्ली में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के हाथ में रहेगा।

कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सामाजिक संतुलन, राजनीतिक संदेश और जीत की संभावना—तीनों को ध्यान में रखते हुए फैसला करे।

राष्ट्रीय स्तर पर असर

देशभर में यह देखा गया है कि मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से में कांग्रेस के प्रति भरोसा कमजोर हुआ है। कई बड़े मुस्लिम नेता जैसे असदुद्दीन ओवैसी का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके अलावा अहमद पटेल के बेटे फैसल अहमद, बिहार के शकील अहमद, कर्नाटक के रोशन बेग और यूपी के नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं का पार्टी छोड़ना भी एक बड़ा संकेत है।

ALSO READ सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल: सीकर में हिंदू भाइयों ने ईदगाह के लिए दान की अपनी बेशकीमती जमीन

राजस्थान का यह राज्यसभा चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के लिए अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ संबंधों की परीक्षा भी है। यदि पार्टी इस बार स्थानीय मुस्लिम चेहरे को मौका देती है, तो यह एक सकारात्मक संदेश जाएगा। लेकिन यदि फिर से बाहरी उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाती है, तो इसके राजनीतिक परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।

फिलहाल, मुस्लिम समुदाय के भीतर एकजुटता की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। जब तक सभी नेता एक मंच पर आकर अपनी मांग को मजबूती से नहीं रखते, तब तक हाईकमान तक प्रभावी दबाव बनाना मुश्किल रहेगा।

अब सबकी नजर जून 2026 पर टिकी है—जहां यह तय होगा कि कांग्रेस अपने पुराने समीकरणों को दोहराती है या एक नया राजनीतिक संदेश देने का साहस दिखाती है।