ईरान पर हमला चाहते थे नेतन्याहू, ओबामा और बुश के बाद ट्रंप हुए राजी
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, वाॅशिंगटन
दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर پر बैठी है। इजरायल और ईरान کے बीच बढ़ता तनाव किसी से छिपा नहीं है। लेकिन हाल ही में अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने एक ऐसा खुलासा किया है जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खलबली मचा दी है। केरी के मुताबिक, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सालों से अमेरिका को ईरान के खिलाफ युद्ध में झोंकने की कोशिश कर रहे थे।
तीन राष्ट्रपतियों ने ठुकराया प्रस्ताव
जॉन केरी ने एक टीवी शो के दौरान बताया कि नेतन्याहू ने ईरान पर हमले का प्रस्ताव एक नहीं बल्कि कई बार दिया। उन्होंने बताया कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और जॉर्ज बुश ने साफ तौर पर मना कर दिया था। यहाँ तक कि वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी इस युद्ध के पक्ष में अपनी सहमति नहीं दी। केरी खुद उन महत्वपूर्ण बातचीत का हिस्सा थे।
अमेरिका के इन बड़े नेताओं का मानना था कि युद्ध अंतिम रास्ता होना चाहिए। जब तक बातचीत और शांति के सारे रास्ते बंद न हो जाएं, तब तक मासूमों की जान जोखिम में डालना सही नहीं है। केरी ने वियतनाम युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि जनता से झूठ बोलकर बेटों को जंग में भेजना बहुत बड़ी गलती होती है।
ट्रंप की मिली ‘हरी झंडी’
हालाँकि, नेतन्याहू की यह ‘हार्ड सेल’ पिच डोनाल्ड ट्रंप के सामने काम कर गई। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 11 फरवरी को सिचुएशन रूम में हुई एक बैठक में नेतन्याहू ने ट्रंप को यकीन दिला दिया कि ईरान में सत्ता पलटने का यह सही समय है। नेतन्याहू का मानना था कि इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान की इस्लामिक सत्ता को खत्म कर सकते हैं।
इस पर ट्रंप का जवाब बहुत हैरान करने वाला था। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “यह मुझे ठीक लग रहा है।” इस एक छोटे से वाक्य ने एक बड़े सैन्य अभियान के लिए रास्ता साफ कर दिया।
जेडी वेंस ने उठाए सवाल
भले ही ट्रंप इस योजना पर राजी हो गए हों, लेकिन उनकी टीम के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस पूरी रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, वेंस और नेतन्याहू के बीच तीखी बहस भी हुई। वेंस का मानना है कि नेतन्याहू ने युद्ध को जितना आसान बताया है, हकीकत वैसी नहीं है।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि नेतन्याहू ने ट्रंप के सामने “सत्ता परिवर्तन” की जो गुलाबी तस्वीर पेश की थी, वह बहुत ही काल्पनिक थी। वेंस इस बात को लेकर स्पष्ट हैं कि बिना पूरी तैयारी और जमीनी सच्चाई जाने युद्ध में उतरना खतरनाक हो सकता है।
निष्कर्ष
यह खुलासा बताता है कि कैसे एक देश का नेता दूसरे शक्तिशाली देश की सेना का इस्तेमाल अपने एजेंडे के लिए करना चाहता था। जॉन केरी की बातें इस ओर इशारा करती हैं कि खुफिया जानकारियों और भविष्यवाणियों के नाम पर अक्सर बड़े देशों को गुमराह किया जाता है। अब देखना यह है कि ट्रंप प्रशासन इस “ग्रीन सिग्नल” के बाद आगे क्या कदम उठाता है और दुनिया पर इसके क्या परिणाम होते हैं।

