ईरान-इजरायल युद्ध में नया मोड़: IRGC की अमेरिका-इजरायल को चेतावनी, निशाने पर यूनिवर्सिटीज
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तेहरान/दुबई
पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भीषण संघर्ष अब रणक्षेत्र से निकलकर शिक्षा और ज्ञान के केंद्रों तक जा पहुँचा है। ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) ने रविवार को एक बेहद कड़ा और चिंताजनक बयान जारी किया है। IRGC ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि क्षेत्र में स्थित अमेरिकी और इजरायली विश्वविद्यालय अब उनके “वैध सैन्य लक्ष्य” (Legitimate Targets) हैं।
यह धमकी ईरान के अपने शैक्षणिक संस्थानों और सांस्कृतिक विरासतों पर हुए हालिया हमलों के प्रतिशोध के रूप में दी गई है। इस घोषणा ने पूरे अरब जगत और पश्चिमी देशों में खलबली मचा दी है, क्योंकि अब तक युद्ध मुख्य रूप से सैन्य ठिकानों और परमाणु केंद्रों तक सीमित माना जा रहा था।
अल्टीमेटम: सोमवार दोपहर तक का समय
ईरानी सरकारी मीडिया (IRIB) द्वारा प्रसारित बयान के अनुसार, IRGC ने जो बाइडेन प्रशासन को सोमवार, 30 मार्च 2026 की दोपहर 12 बजे (तेहरान समय) तक का अल्टीमेटम दिया है। ईरान की मांग है कि अमेरिका सार्वजनिक रूप से ईरानी विश्वविद्यालयों पर हुए बमबारी की निंदा करे। यदि ऐसा नहीं होता है, तो IRGC ने जवाबी कार्रवाई के तहत क्षेत्र के अमेरिकी और इजरायली शिक्षण संस्थानों को नष्ट करने की बात कही है।
सावधानी की अपील: ईरानी सेना ने एक कदम आगे बढ़ते हुए इन विश्वविद्यालयों के स्टाफ, प्रोफेसरों, छात्रों और आसपास रहने वाले नागरिकों को सलाह दी है कि वे अपनी जान बचाने के लिए कैंपस से कम से कम एक किलोमीटर की दूरी बना लें।
क्यों भड़का है ईरान? ‘ऑपरेशन अगेंस्ट नॉलेज’ का आरोप
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक विस्तृत पोस्ट साझा की है। उन्होंने अमेरिका और इजरायल पर “सोची-समझी रणनीति” के तहत ईरान की वैज्ञानिक नींव को हिलाने का आरोप लगाया है।
बाकई के मुख्य आरोप:
- शैक्षणिक संस्थानों पर हमले: पिछले 30 दिनों के संघर्ष के दौरान ‘इस्फहान यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी’ और ‘तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को निशाना बनाया गया है।
- वैज्ञानिकों की हत्या: तेहरान का दावा है कि इजरायल और अमेरिका केवल परमाणु कार्यक्रम को नहीं रोक रहे, बल्कि ईरान के प्रमुख वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को भी चुन-चुन कर निशाना बना रहे हैं।
- सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश: ईरान का आरोप है कि सैन्य ठिकानों के बहाने उनके ऐतिहासिक स्मारकों और शोध केंद्रों पर बमबारी की जा रही है ताकि देश की बौद्धिक विरासत को मिटाया जा सके।
विशेषज्ञों का विश्लेषण: क्या यह ‘साइकोलॉजिकल वारफेयर’ है?
वरिष्ठ कूटनीतिक पत्रकारों का मानना है कि IRGC का यह बयान केवल एक धमकी नहीं, बल्कि एक गहरा कूटनीतिक संदेश है। पश्चिम एशिया में दर्जनों अमेरिकी विश्वविद्यालय और अनुसंधान केंद्र (जैसे दुबई, कतर और लेबनान में) सक्रिय हैं। इन्हें निशाना बनाने की धमकी देकर ईरान सीधे तौर पर अमेरिका पर दबाव बनाना चाहता है ताकि वह इजरायल की आक्रामक कार्रवाई को नियंत्रित करे।
दूसरी ओर, इजरायल और अमेरिका ने हमेशा यह तर्क दिया है कि ईरान अपने शैक्षणिक संस्थानों का उपयोग ड्रोन तकनीक, मिसाइल प्रोग्राम और परमाणु शोध के लिए ‘कवर’ के रूप में करता है। हालांकि, सीधे तौर पर यूनिवर्सिटी कैंपस को युद्ध में घसीटना अंतरराष्ट्रीय कानूनों (International Law) के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है, जिसे लेकर अब वैश्विक मानवाधिकार संगठन भी सतर्क हो गए हैं।
क्षेत्रीय स्थिरता पर संकट के बादल
आज ही इस्लामाबाद में पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक हो रही है, जिसका उद्देश्य तनाव कम करना है। लेकिन ठीक उसी समय IRGC का यह ‘यूनिवर्सिटी वॉर’ वाला बयान शांति प्रयासों को बड़ा झटका दे सकता है।
यदि ईरान वास्तव में किसी विदेशी यूनिवर्सिटी को निशाना बनाता है, तो यह युद्ध का दायरा उन देशों तक फैला देगा जहाँ ये संस्थान स्थित हैं। इससे खाड़ी देशों (Gulf Countries) की सुरक्षा और वहां रह रहे लाखों विदेशी नागरिकों की सुरक्षा पर गंभीर सवालिया निशान लग जाएगा।
मुख्य बिंदु जो आपको जानने चाहिए:
- टारगेट: पश्चिम एशिया (दुबई, कतर, जॉर्डन आदि) में स्थित अमेरिकी और इजरायली संबद्ध शिक्षण संस्थान।
- कारण: तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पर हालिया बमबारी का बदला।
- समय सीमा: 30 मार्च 2026, दोपहर 12 बजे तक अमेरिकी निंदा की मांग।
- ईरान का दावा: इजरायल का असली मकसद परमाणु रोकना नहीं, बल्कि ईरान की ‘बौद्धिक शक्ति’ को खत्म करना है।
निष्कर्ष
एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते, इस स्थिति को मैं “बुद्धिजीवी युद्ध” (Intellectual Warfare) के चरम रूप में देखता हूँ। जब मिसाइलें प्रयोगशालाओं और कक्षाओं की ओर मुड़ने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि कूटनीति पूरी तरह विफल हो चुकी है। अब सबकी नजरें वाशिंगटन और तेल अवीव की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। क्या वे ईरान की इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे, या पश्चिम एशिया में हिंसा की एक नई और अधिक भयानक लहर शुरू होगी?
अगले 24 घंटे वैश्विक राजनीति और हजारों छात्रों के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं।

