आरक्षण नहीं, फिर जातिगत गणना क्यों? मुस्लिम समाज का बड़ा सवाल
मुस्लिम नाउ विशेष
जातिगत जनगणना पर देश में सियासत तेज़ हो चुकी है, जबकि इसकी शुरुआत होने में अभी दो साल का वक्त बाकी है और न ही कोई स्पष्ट नीति सामने आई है। इसके बावजूद मुस्लिम समाज को केंद्र में रखकर जिस तरह की सक्रियता दिखाई जा रही है, वह सोचने पर मजबूर करती है। खासतौर पर वे संगठन जो वर्षों से मुसलमानों की एकता को तोड़ने की कोशिश करते आए हैं, अब जातिगत जनगणना को नया हथियार बना रहे हैं।
बीते वर्षों में पहले शिया-सुन्नी विवाद को हवा दी गई, फिर “पसमांदा” का मुद्दा उठाकर समाज में खाई बनाने की कोशिश की गई। लेकिन जब ये दोनों प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए, तब अब जातीय गणना के बहाने मुस्लिम समाज को बांटने की नई रणनीति बनाई जा रही है। इसके लिए एक सत्ताधारी राजनीतिक दल ने अपनी मुस्लिम इकाई को विशेष रूप से सक्रिय किया है, जबकि उसके मातृ संगठन के मुस्लिम चेहरे भी इस काम में लगाए गए हैं। इनका उद्देश्य साफ है—मुसलमानों की सामाजिक एकता को जाति के नाम पर तोड़ना।
मगर भारत के आम मुसलमान इस कोशिश को समझ रहे हैं और सीधा सवाल उठा रहे हैं: जब धर्म के आधार पर उन्हें आरक्षण नहीं दिया जा सकता, तो वे जातिगत जनगणना में हिस्सा क्यों लें? यह सवाल उस समय और प्रासंगिक हो जाता है जब वही राजनीतिक दल, जो आज पसमांदा के नाम पर मुसलमानों की बात करता है, कर्नाटक और तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण का खुला विरोध कर चुका है। यहां तक कि कर्नाटक सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों को 4% आरक्षण देने के ऐलान के विरोध में उसी दल के नेता खड़े हो गए थे और चुनाव में इसे मुद्दा बनाकर मुसलमानों को निशाना बनाया गया।
इस पृष्ठभूमि में आम मुसलमानों की राय बन चुकी है कि यदि उन्हें शिक्षा, नौकरी और अन्य क्षेत्रों में आरक्षण या विशेष सुविधा नहीं दी जा रही, तो जातिगत जनगणना में हिस्सा लेने का क्या औचित्य है? मुसलमानों की एक बड़ी संख्या इस जनगणना में अपनी जाति के स्थान पर केवल ‘मुसलमान’ लिखवाने का मन बना चुकी है। इसके लिए कई मुस्लिम संगठन ज़मीन पर काम भी शुरू कर चुके हैं।
सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग पहले ही बता चुके हैं कि भारत में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति दलितों से भी बदतर है। इसके बावजूद आज तक उन्हें कोई ठोस लाभ नहीं मिला, न आरक्षण, न ही निर्णायक भागीदारी। ऐसे में जातीय आंकड़ों का उपयोग किसके हित में होगा, यह सवाल भी उठना लाज़िमी है।
बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में जातिगत जनगणना पहले ही हो चुकी है, लेकिन वहां के मुसलमानों को क्या लाभ मिला? जब कांग्रेस जैसी पार्टी भी कर्नाटक में आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण नहीं दे सकी, तो इस पूरी कवायद का अर्थ ही क्या रह जाता है?
इसके साथ ही एक और सवाल उठा है—जो लोग ‘पसमांदा’ शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या उन्होंने अब तक यह स्पष्ट किया है कि वे मुसलमानों को आरक्षण देंगे? क्या वे इस समाज के अधिकारों की गारंटी देंगे? विडंबना यह है कि एक तरफ मुस्लिम समाज के भीतर समानता की अवधारणा—”एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़”—को झुठलाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आरक्षण के विरोध में खड़े होकर मुसलमानों को महज़ सांस्कृतिक और पारिवारिक कानूनों में ‘हक़दारी’ के सपने दिखाए जा रहे हैं।
सत्ता में भागीदारी देने को तैयार नहीं, पार्टी में नेतृत्व का अवसर नहीं, मगर मुसलमानों की संपत्ति और कानूनों में हिस्सेदारी का झांसा—यह दोहरी राजनीति अब जगज़ाहिर हो चुकी है। स्कॉलरशिप बंद कर दी गई, अल्पसंख्यकों के नाम पर बने पदों पर दूसरे समुदाय के लोगों को नियुक्त कर दिया गया—ऐसे में सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी भला किस तरह भरोसा करे?
यह तय है कि अब मुसलमान झांसे में नहीं आने वाले। वे अपनी सामाजिक एकता और पहचान को बचाने के लिए पहले से ज़्यादा सजग हैं। जातिगत जनगणना उनके लिए कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि एक नीतिगत धोखे की आशंका बन चुकी है।

