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तेल की आग और सुलगती जेब: खाड़ी का युद्ध कैसे भारत में महंगाई का ‘विस्फोट’ करने वाला है ? एक विशेष

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, वॉशिंगटन/दुबई

मिडल ईस्ट में इस समय सिर्फ मिसाइलें नहीं गिर रही हैं। वहां वैश्विक अर्थव्यवस्था की बुनियाद भी दरक रही है। ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा यह महायुद्ध अब उस मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ से पूरी दुनिया की रसोई और गाड़ी का बजट बिगड़ने वाला है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतन्याहू जिस ‘अंडरग्राउंड मिशन’ की बात कर रहे हैं वह असल में दुनिया के तेल सप्लाई नेटवर्क के लिए ‘डेथ वारंट’ साबित हो सकता है।

भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। हम अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा आयात करते हैं। इसमें से एक बड़ा हिस्सा उसी खाड़ी क्षेत्र से आता है जो इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है।


होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की ‘गला दबाने’ वाली नस

दुनिया का सबसे बड़ा डर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को लेकर है। यह समुद्र का वह संकरा रास्ता है जहाँ से दुनिया का एक-तिहाई तेल गुजरता है। ईरान ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह इस रास्ते को बंद कर सकता है।

अगर ईरान ऐसा करता है तो वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मच जाएगा। ब्रेंट क्रूड जो अभी 85 डॉलर के आसपास है वह रातों-रात 120 या 150 डॉलर तक पहुँच सकता है। इसका सीधा मतलब है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 150 रुपये प्रति लीटर के पार जा सकती हैं।


भारत पर पड़ने वाले ‘ट्रिपल अटैक’ को समझिए

जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत पर केवल पेट्रोल पंप पर ही असर नहीं पड़ता। इसके तीन बड़े और खतरनाक प्रभाव होते हैं:

1. परिवहन और महंगाई का चक्र भारत में ज्यादातर माल ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है। डीजल महंगा होते ही सब्जियों, फल और अनाज की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। किसान के ट्रैक्टर से लेकर फैक्ट्री की मशीन तक सब कुछ महंगा हो जाएगा।

2. रुपये की गिरती साख भारत को तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है और रुपया कमजोर होता है। रुपया कमजोर होने का मतलब है कि विदेश से आने वाली हर चीज जैसे मोबाइल, लैपटॉप और दवाइयां भी महंगी हो जाएंगी।

3. सरकारी खजाने पर बोझ सरकार को बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए टैक्स कम करना पड़ता है। इससे सरकारी खजाना खाली होता है। इसका असर देश के विकास कार्यों जैसे सड़क, स्कूल और अस्पतालों पर पड़ता है।


ट्रंप और नेतन्याहू की रणनीति में ‘होल’ कहाँ है?

विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन ने इस युद्ध को शुरू तो कर दिया लेकिन इसका आर्थिक अंत क्या होगा? इजरायल का ‘बंकर बस्टर’ मिशन ईरान के परमाणु ठिकानों को तो तबाह कर सकता है लेकिन वह तेल के कुओं और रिफाइनरियों को सुरक्षा नहीं दे सकता।

ईरान ने पहले ही यूएई और सऊदी अरब की रिफाइनरियों पर हमले शुरू कर दिए हैं। अगर ये रिफाइनरियां बंद होती हैं तो दुनिया में तेल की भारी कमी हो जाएगी। क्या अमेरिका के पास इसका कोई वैकल्पिक प्लान है? फिलहाल तो ऐसा कुछ नजर नहीं आता। ट्रंप केवल सैन्य जीत की बात कर रहे हैं लेकिन वैश्विक सप्लाई चेन की बर्बादी पर वे खामोश हैं।


भारतीय प्रवासियों का संकट और ‘रेमिटेंस’

खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं। ये लोग हर साल अरबों डॉलर भारत भेजते हैं जिसे ‘रेमिटेंस’ कहा जाता है।

  • युद्ध की वजह से अगर तेल उद्योग ठप होता है तो लाखों भारतीयों की नौकरियां जा सकती हैं।
  • भारत आने वाला विदेशी पैसा कम हो जाएगा।
  • बड़ी संख्या में लोगों की वापसी भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ाएगी।

निष्कर्ष: क्या है बचने का रास्ता?

भारत के लिए यह समय बहुत ही सतर्क रहने का है। हमें अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहना अब भारी पड़ रहा है। सरकार को रूस और अफ्रीकी देशों से तेल आयात बढ़ाने की कोशिश करनी होगी। साथ ही देश के भीतर रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को पूरी तरह भरने का यह आखिरी मौका है।

ईरान-इजरायल युद्ध केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है। यह हर उस भारतीय की जेब पर हमला है जो सुबह अपनी गाड़ी में तेल भरवाता है या बाजार से सब्जी खरीदता है। अगर ट्रंप और नेतन्याहू ने जल्द ही कोई कूटनीतिक रास्ता नहीं निकाला तो यह ‘अंडरग्राउंड मिशन’ दुनिया को एक बड़े आर्थिक मंदी (Global Recession) के गर्त में धकेल देगा।

तुलनात्मक डेटा टेबल: 10 डॉलर की बढ़त और भारत का गणित

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि कच्चे तेल की कीमतों में सिर्फ 10 डॉलर का उछाल भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतकों (Economic Indicators) को किस तरह प्रभावित करता है:

आर्थिक मानक (Economic Indicator)संभावित प्रभाव (Impact of +$10/Barrel)प्रभाव का कारण (The ‘Why’)
जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth)-0.5% (कमी)उत्पादन लागत बढ़ने से औद्योगिक गतिविधियों में सुस्ती।
महंगाई दर (CPI Inflation)+0.5% से +0.6% (बढ़ोतरी)परिवहन और रसद (Logistics) के महंगे होने से वस्तुओं के दाम बढ़ना।
करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD)+$15 बिलियन (बढ़ोतरी)तेल आयात बिल में भारी वृद्धि, जो जीडीपी का लगभग 0.4-0.5% है।
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)+0.43% (बढ़ोतरी)यदि सरकार जनता को राहत देने के लिए एक्साइज ड्यूटी कम करती है।
रुपये की कीमत (INR Value)कमजोरी (Depreciation)डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये का 92-93 के स्तर तक गिरना।
विदेशी मुद्रा भंडार (Forex)तेजी से गिरावटबढ़ते आयात बिल का भुगतान करने के लिए डॉलर की भारी निकासी।