TOP STORIES

प्रोफेसर फ्रांसिस हैल्ज़ेन : एएमयू के छात्रों का कमाल, नोबेल विजेता प्रोजेक्ट से जुड़ा नाम

नौशाद अख्तर, अलीगढ़

इस साल के नोबेल पुरस्कारों के ऐलान ने भारत को एक बेहद गर्व और उत्साह से भर दिया है। भले ही मुख्य नोबेल पुरस्कार भारत की झोली में सीधे तौर पर न आया हो, लेकिन इस प्रतिष्ठित वैश्विक सम्मान से देश का नाता बहुत गहराई से जुड़ गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने और गौरवान्वित करने वाली बात यह है कि इस बार भौतिकी का नोबेल जीतने वाले प्रसिद्ध ‘आइसक्यूब कोलैबोरेशन’ प्रोजेक्ट के साथ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के तीन पीएचडी छात्र बतौर शोधार्थी जुड़े हुए हैं। इस बड़ी कामयाबी के बाद से यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर पूरे देश के वैज्ञानिक जगत में खुशी की लहर दौड़ गई है।

वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष और ब्रह्मांड के रहस्यों की खोज करने वाले ‘आइसक्यूब कोलैबोरेशन’ के प्रमुख और इस क्रांतिकारी आइडिया के जनक प्रोफेसर फ्रांसिस हैल्ज़ेन को साल 2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनके साथ ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तीन मेधावी पीएचडी छात्र अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग और कृष्णमूर्ति जयकुमार इस ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित वैश्विक प्रोजेक्ट का अहम हिस्सा बने हुए हैं।

न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान की अनोखी नींव

प्रोफेसर फ्रांसिस हैल्ज़ेन की दूरगामी सोच ने खगोल विज्ञान की दुनिया में एक बिल्कुल नई और अनोखी शाखा यानी न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान की मजबूत नींव रखी। उनका यह क्रांतिकारी विचार दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद विशाल ग्लेशियर की मोटी और साफ बर्फ को ‘न्यूट्रिनो’ जैसे बेहद रहस्यमयी और मुश्किल से पकड़ में आने वाले सब-एटॉमिक कणों के लिए एक प्राकृतिक डिटेक्टर में बदलना था। इसी अनोखी सोच के दम पर ‘आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी’ का निर्माण संभव हो सका। इस आधुनिक वेधशाला की मदद से वैज्ञानिक अब दूर-दराज के ब्रह्मांड से अंतरिक्ष में सफर तय करके आने वाले न्यूट्रिनो कणों का आसानी से पता लगाते हैं और उनकी बारीकी से जांच करते हैं।

भौगोलिक रूप से दक्षिणी ध्रुव पर अंटार्कटिक की बेहद ठंडी बर्फ के भीतर गहराई में तैयार की गई यह आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी आज हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो की स्टडी करने वाली दुनिया की सबसे प्रमुख वैज्ञानिक सुविधाओं में गिनी जाती है। हालांकि यह प्रोजेक्ट पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से लगातार डेटा इकट्ठा करने के काम में जुटा है, लेकिन इस विशाल ढांचे का निर्माण कार्य करीब सत्रह साल पहले शुरू किया गया था।

ब्रह्मांड के अनसुने रहस्यों से पर्दा

इस ऑब्जर्वेटरी ने दुनिया भर के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को हमारी अपनी आकाशगंगा के बाहर से आने वाले हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो के बहाव को बिल्कुल अलग करके समझने में बहुत बड़ी मदद की है। इस ऊर्जा प्रवाह की सटीकता की तुलना नासा के मशहूर फर्मी सैटेलाइट द्वारा खोजे गए एक्स्ट्रा-गैलेक्टिक हाई-एनर्जी फोटॉन प्रवाह के साथ की जाती है। पिछले दस सालों से ज्यादा वक्त से चल रहे इन अवलोकनों के आंकड़ों के विश्लेषण से वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में इन हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो के मुख्य स्रोतों की पहचान करने में भी काफी मदद मिली है। इससे साफ पता चलता है कि कुछ चुनिंदा सक्रिय आकाशगंगाओं के भीतर मौजूद सुपरमैसिव ब्लैक होल के आसपास के घने इलाके शक्तिशाली कॉस्मिक एक्सेलेरेटर की तरह काम करते हैं।

एएमयू के न्यूट्रिनो फिजिक्स प्रोग्राम को मिली वैश्विक पहचान

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग के अध्यक्ष और न्यूट्रिनो भौतिकी के जाने-माने विशेषज्ञ प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद अथर की देखरेख में ये तीनों पीएचडी स्कॉलर अपना उच्चस्तरीय शोध कार्य आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने तीनों छात्रों की इस शानदार उपलब्धि पर उन्हें दिल से बधाई दी और अपनी खुशी का इजहार किया।

प्रोफेसर अथर ने कहा कि यह वैश्विक मान्यता एएमयू के न्यूट्रिनो फिजिक्स रिसर्च प्रोग्राम के लिए बहुत ज्यादा मायने रखती है। यह इस बात का पुख्ता सबूत है कि आधुनिक पार्टिकल फिजिक्स के सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में हमारी यूनिवर्सिटी लगातार और मजबूती से अपनी भागीदारी निभा रही है। इस बड़ी सफलता ने न सिर्फ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बल्कि पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

सवाल और जवाब

2026 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार किसे मिला?
प्रोफेसर फ्रांसिस हेल्जेन को 2026 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी में निर्णायक योगदान और खगोलीय स्रोतों से आने वाले हाई एनर्जी न्यूट्रिनो की खोज के लिए सम्मानित किया गया। IceCube

IceCube क्या है?
यह दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में बनाया गया विशाल न्यूट्रिनो डिटेक्टर है। इसका आकार लगभग एक घन किलोमीटर है।

AMU का इससे क्या संबंध है?
AMU के शोधार्थी आइसक्यूब डीपकोर से जुड़े न्यूट्रिनो शोध में योगदान दे रहे हैं। अनुज कुमार उपाध्याय और गोपाल गर्ग के शोध में आइसक्यूब सहयोग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। DOI

न्यूट्रिनो को घोस्ट पार्टिकल क्यों कहा जाता है?
क्योंकि ये पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं और बड़ी संख्या में पृथ्वी के आरपार गुजर सकते हैं।

इस उपलब्धि का अलीगढ़ के लिए क्या महत्व है?
यह AMU के न्यूट्रिनो भौतिकी शोध और उसके अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग की पहुंच को सामने लाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *