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अल-अक्सा पर पाबंदी: OIC की ‘कड़ी निंदा’ पर भड़का मुस्लिम वर्ल्ड, सोशल मीडिया पर पूछा- सिर्फ शब्दों से कब तक बचेगा किबला-ए-अव्वल?

रमजान का मुकद्दस महीना जारी है। दुनिया भर के मुसलमान इबादत में मशगूल हैं। लेकिन यरूशलेम की ऐतिहासिक अल-अक्सा मस्जिद से आती तस्वीरें दिल दुखाने वाली हैं। इजरायली अधिकारियों ने लगातार आठवें दिन मस्जिद के दरवाजे नमाजियों के लिए बंद रखे हैं। इस बीच जेद्दा स्थित ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) ने एक बयान जारी कर इसकी कड़ी आलोचना की है। लेकिन इस बार ओआईसी का यह ‘निंदा वाला अंदाज’ दुनिया भर के मुसलमानों को रास नहीं आ रहा है।

ओआईसी का बयान: चेतावनी या सिर्फ औपचारिकता?

ओआईसी के जनरल सेक्रेटेरिएट ने इजरायली कार्रवाई को इबादत की आजादी का खुला उल्लंघन बताया है। संगठन ने कहा कि अल-अक्सा जैसी पवित्र जगह को बंद रखना दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने वाली हरकत है। ओआईसी ने चेतावनी दी है कि यरूशलेम की पवित्रता के खिलाफ किए जा रहे ये व्यवस्थित हमले इलाके में हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा देंगे।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब इजरायल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक संयुक्त सैन्य अभियान छेड़ रखा है। इस तनावपूर्ण माहौल में अल-अक्सा पर पाबंदी ने आग में घी डालने का काम किया है। ओआईसी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दखल देने की अपील की है।


सोशल मीडिया पर गुस्से का गुबार: ‘निंदा’ नहीं ‘एक्शन’ चाहिए

ओआईसी का बयान जैसे ही सोशल मीडिया पर आया, प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। ज्यादातर यूजर्स ने ओआईसी की सुस्ती और केवल कागजी कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर की है। ट्विटर (X) पर लोगों ने ओआईसी को ‘निकम्मा’ तक करार दे दिया।

प्रमुख प्रतिक्रियाएं:

  • साजिद रज़ा नाम के एक यूजर ने लिखा, “ओआईसी का बयान नोट कर लिया गया है। लेकिन अब सिर्फ निंदा काफी नहीं है। मुस्लिम दुनिया अब ठोस और व्यावहारिक कदम चाहती है। हर संकट के बाद वही पुराने शब्द दोहराना अब बंद होना चाहिए।”
  • मोहम्मद उस्मान ने तंज कसते हुए ओआईसी (OIC) का नया फुल फॉर्म बताया। उन्होंने लिखा, “ओआईसी मतलब- ऑर्गनाइजेशन ऑफ इजरायल कंडमनेशन (इजरायल की निंदा करने वाला संगठन)।”
  • रेहमान पर्राय ने सवाल उठाया, “यह निंदा कब तक चलेगी? अल-अक्सा पर हर बार हमला होता है और ओआईसी सिर्फ कागजी काम करता है। किबला-ए-अव्वल की हिफाजत सबकी जिम्मेदारी है।”
  • सैनी नाम के यूजर ने लिखा, “एक और निंदा… बहुत बढ़िया!”

ईरान और फिलिस्तीन पर खामोशी पर उठे सवाल

सोशल मीडिया पर लोग इस बात से भी नाराज हैं कि जब ईरान पर हमले हो रहे हैं, तो 57 मुस्लिम देश एकजुट क्यों नहीं हैं। मोहम्मद नाम के एक यूजर ने लिखा, “हम 57 मुस्लिम देश हैं। हमारी आबादी 2 अरब है। दुनिया का 25% हिस्सा होने के बाद भी कोई देश ईरान के साथ खड़ा नहीं दिख रहा है। अगर हम फिलिस्तीन या ईरान के अपने मजलूम भाई-बहनों के साथ नहीं खड़े हो सकते, तो हमें खुद को मुसलमान कहने पर क्या गर्व होना चाहिए?”

कुछ यूजर्स ने तो यहां तक आरोप लगाया कि ओआईसी के कई सदस्य देश पर्दे के पीछे से इजरायल और अमेरिका के मददगार बने हुए हैं। ताबरेज आलम ने लिखा, “आप अमेरिका और इजरायल के सहयोगी हैं। आप पिछले कई सालों की तरह सिर्फ निंदा ही कर सकते हैं।”


देरी से आई प्रतिक्रिया पर नाराजगी

ओआईसी के बयान को ‘देर से आया हुआ’ बताया जा रहा है। रागा द वॉरियर ने लिखा, “अल-अक्सा को बंद करने पर ओआईसी की प्रतिक्रिया बहुत देर से आई। ये बयान बहुत पहले आने चाहिए थे। कयामत के दिन नेता अल्लाह को क्या जवाब देंगे जब उनसे उम्मत की पवित्रता और बेगुनाहों की जान पर उनकी खामोशी के बारे में पूछा जाएगा?”

क्या ओआईसी अपनी प्रासंगिकता खो रहा है?

जानकारों का मानना है कि ओआईसी जैसे बड़े संगठनों के पास आर्थिक और राजनयिक दबाव बनाने की अपार शक्ति है। इसके बावजूद वे केवल प्रेस रिलीज तक सीमित रहते हैं। यरूशलेम में जिस तरह से नमाजियों को रोका जा रहा है, उसने यह साबित कर दिया है कि इजरायल को अंतरराष्ट्रीय निंदा का कोई डर नहीं है।

मुस्लिम समुदाय अब केवल ट्विटर हैंडल्स से जारी होने वाले बयानों से संतुष्ट नहीं है। वे चाहते हैं कि मुस्लिम देश एकजुट होकर इजरायल पर आर्थिक प्रतिबंध लगाएं या कम से कम अपनी सीमाओं और संसाधनों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करें।

निष्कर्ष

अल-अक्सा का बंद होना सिर्फ एक मस्जिद का मुद्दा नहीं है। यह करोड़ों मुसलमानों की आस्था और मानवाधिकारों का सवाल है। ओआईसी की ‘कड़ी निंदा’ अब एक मजाक की तरह देखी जा रही है। जब तक 57 देश एक मंच पर आकर कोई सख्त कूटनीतिक कदम नहीं उठाते, तब तक ऐसी पाबंदियां और हमले जारी रहेंगे। दुनिया देख रही है कि क्या मुस्लिम नेतृत्व अपनी सामूहिक शक्ति का परिचय देगा या फिर एक और निंदा प्रस्ताव के साथ अगले संकट का इंतजार करेगा।