जमीयत बैठक में बढ़ती सांप्रदायिकता और मुस्लिम मुद्दों पर गंभीर चिंता
नई दिल्ली।
मौलाना अरशद मदनी की अध्यक्षता में जमीयत उलेमा ए हिंद की कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक संपन्न हुई। बैठक के बाद जारी घोषणापत्र में देश के मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। संगठन ने कहा कि देश में बढ़ती सांप्रदायिकता, नफरत आधारित राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
घोषणापत्र में कहा गया कि मुसलमानों और इस्लामी प्रतीकों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। संगठन ने दावा किया कि देश का माहौल डर और अविश्वास की ओर धकेला जा रहा है। इसके बावजूद मुसलमान अपने संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण और कानूनी संघर्ष जारी रखेंगे।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि देश में नफरत की राजनीति अब धमकी की राजनीति में बदलती दिखाई दे रही है। लोगों को धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश हो रही है। इससे समाज में तनाव बढ़ रहा है। संगठन का कहना है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल बढ़ा है और इसका असर सामाजिक सौहार्द पर पड़ रहा है।
जमीयत ने अपने बयान में कहा कि सरकारें न्याय और समानता के सिद्धांतों पर चलती हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में भय और दबाव की राजनीति लंबे समय तक टिक नहीं सकती। संगठन ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक बयान समाज को विभाजित करने का काम कर रहे हैं जबकि प्रशासनिक संस्थाएं कई मामलों में निष्क्रिय नजर आती हैं।
जमीयत उलमा-ए-हिंद की कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक का घोषणापत्र ।
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) May 17, 2026
देश के वर्तमान हालात, बढ़ती सांप्रदायिकता, संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी, मुसलमानों और इस्लामी प्रतीकों के खिलाफ बढ़ते कदम तथा नफरत आधारित राजनीति अत्यंत चिंताजनक है। हालाँकि मुसलमान न कभी झुका है और न कभी झुकेगा।…
बैठक में पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री के उस कथित बयान का भी उल्लेख किया गया जिसमें कहा गया था कि वे “सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करेंगे।” जमीयत ने इस तरह के बयान को संविधान की भावना के खिलाफ बताया। संगठन ने कहा कि किसी भी मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना है। संविधान किसी भी सरकार को धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता।
घोषणापत्र में कहा गया कि देश को एक विशेष वैचारिक दिशा में ले जाने की कोशिश की जा रही है। समान नागरिक संहिता, वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने की मांग, मस्जिदों और मदरसों से जुड़े मामलों तथा मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को संगठन ने इसी क्रम का हिस्सा बताया। जमीयत ने कहा कि वह इन सभी मुद्दों पर कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी रखेगी।
बैठक में यह भी कहा गया कि मुसलमानों को केवल धार्मिक स्तर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मोर्चों पर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वक्ताओं ने कहा कि समुदाय को शिक्षा, संगठन और संवैधानिक जागरूकता पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। युवाओं से अपील की गई कि वे शिक्षा हासिल करें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं।
संगठन ने दावा किया कि वर्ष 2014 के बाद कई ऐसे कानून और नीतिगत फैसले सामने आए जिनसे मुसलमानों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है। घोषणापत्र में कहा गया कि अब केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि इस्लाम को भी निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि जमीयत ने यह भी कहा कि किसी भी धर्म या समुदाय के खिलाफ नफरत देश के हित में नहीं है और इससे लोकतंत्र कमजोर होता है।
बैठक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम को लेकर चल रहे विमर्श का भी जिक्र हुआ। वक्ताओं ने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में इस्लाम और मुसलमानों के प्रति नकारात्मक धारणा बनाने की कोशिशें हो रही हैं। इसके बावजूद संगठन ने विश्वास जताया कि धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक न्याय की भावना अंततः मजबूत होगी।
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मौलाना अरशद मदनी ने अपने संबोधन में कहा कि मुसलमानों को भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय संवैधानिक रास्ता अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं ही देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने समुदाय से धैर्य बनाए रखने और शिक्षा तथा सामाजिक सुधार पर ध्यान देने की अपील की।
बैठक में यह भी कहा गया कि देश की विविधता उसकी सबसे बड़ी पहचान है। भारत हमेशा विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों का साझा देश रहा है। ऐसे में किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक राजनीति राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है। संगठन ने कहा कि समाज के सभी वर्गों को मिलकर भाईचारे और आपसी विश्वास को मजबूत करना होगा।
घोषणापत्र में न्यायप्रिय राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज से भी अपील की गई। जमीयत ने कहा कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए साझा प्रयास जरूरी हैं। संगठन ने देश में भाईचारा, सहिष्णुता और न्याय की भावना को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया।
बैठक के अंत में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा। संगठन ने कहा कि वह संविधान और कानून के दायरे में रहकर अपने अधिकारों की आवाज उठाता रहेगा। साथ ही देश में शांति, सामाजिक सौहार्द और समान नागरिक अधिकारों के लिए काम करने का संकल्प दोहराया गया।

