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मेवात के खिलाफ ‘डिजिटल नरेटिव’ और हकीकत की जमीन

पत्रकारिता जब चश्मे उतारकर नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह पहनकर की जाती है, तो वह समाज का आईना नहीं बल्कि एक धुंधली तस्वीर बन जाती है। हाल ही में एक चर्चित क्षेत्रीय चैनल की एंकर और एक सामाजिक कार्यकर्ता के बीच हुई बातचीत इसका जीता जागता सबूत है। एंकर का दावा है कि उन्होंने मेवात को करीब से देखा है। लेकिन उनके शब्दों में मेवात की जो तस्वीर उभरी, वह किसी डार्क कॉमेडी जैसी लगती है।

क्या वाकई मेवात में स्कूल और कॉलेज नहीं हैं?

एंकर ने एक झटके में कह दिया कि मेवात में न स्कूल हैं, न कॉलेज। उन्होंने यह भी दावा किया कि यहां की लड़कियां दसवीं से आगे नहीं पढ़तीं। यह सुनकर किसी भी जानकार व्यक्ति को हंसी आ सकती है। शायद उन्होंने नूंह के नल्हड़ मेडिकल कॉलेज की आलीशान इमारत नहीं देखी। या फिर उन्हें फिरोजपुर झिरका के उस पुराने महिला कॉलेज का पता नहीं है, जो दशकों से बेटियों का भविष्य संवार रहा है।

नूंह का चंदैनी गांव आज महिला शिक्षा के लिए एक मिसाल बन चुका है। इस गांव की बेटियां आज अंतरराष्ट्रीय एयर सर्विसेज में काम कर रही हैं। मेवात का युवा परवेज आज विदेश में स्कॉलरशिप पर पढ़ाई कर रहा है। वह एक अंतरराष्ट्रीय धावक भी है। सवाल यह है कि क्या ये सब बिना स्कूल और कॉलेज के संभव हुआ?

विकास की बदलती सूरत और ‘टॉकिंग पॉइंट’

एंकर को मेवात में चाय की टपरी तक नहीं मिली। सड़कों पर सिर्फ धूल और गड्ढे नजर आए। हकीकत इसके उलट है। सोहना से नूंह का रास्ता अब मिनटों का रह गया है। इसी मेवात के सीने से होकर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे गुजरता है। नूंह का नया मिनी सचिवालय किसी भी आधुनिक शहर के प्रशासनिक केंद्र को टक्कर देता है।

दिलचस्प बात यह है कि देश का पहला अस्पताल, जो विदेशी पूंजी के सहयोग से बना था, वह मेवात के बड़कली के पास ही है। वक्फ बोर्ड का इंजीनियरिंग कॉलेज सालों से यहां तकनीकी शिक्षा की लौ जला रहा है। यह सब विकास रातों-रात नहीं हुआ। इसके लिए मेवात के नेताओं और जनता ने लंबी लड़ाई लड़ी है।

गुरुग्राम की चमक के पीछे का अंधेरा

मेवात पर उंगली उठाने वाली पत्रकार को शायद गुरुग्राम की असलियत नहीं पता। कहने को गुरुग्राम ‘मिलेनियम सिटी’ है। लेकिन बारिश में यह शहर टापू बन जाता है। पुराने गुरुग्राम की सड़कें किसी पिछड़े जिले की याद दिलाती हैं। वहां की बसों की हालत क्या है? वहां के बस अड्डे की स्थिति क्या है?

पिछले पंद्रह सालों में गुरुग्राम में अरबों का निवेश आया। फिर भी वहां मेट्रो का विस्तार पुराने शहर तक नहीं हो सका। नया बस अड्डा आज भी कागजों पर है। अगर मेवात के नेता ‘नकारा’ हैं, तो गुरुग्राम के चमकते नेताओं ने वहां विकास के झंडे क्यों नहीं गाड़े? गुरुग्राम रेलवे स्टेशन का कायाकल्प भी केंद्र सरकार की योजना के तहत हो रहा है, न कि स्थानीय विकास के कारण।

मेवात को बदनाम करने का पुराना खेल

मेवात को हमेशा एक खास नजरिए से देखा गया है। कभी इसे ‘टटलू गिरोह’ का अड्डा कहा गया, कभी ‘गौ-तस्करी’ का इलाका। अब इसे ‘साइबर ठगी’ का नया केंद्र बताया जा रहा है। दशकों पहले भी एक तथाकथित साहित्यकार ने मेवात के पहाड़ों पर किताब लिखकर अपनी दुकान चमकाई थी। उन्होंने साहित्यिक ढंग से मेवात की बुराई की।

आज की डिजिटल पत्रकारिता भी उसी पुराने ढर्रे पर है। बिना शोध किए, सिर्फ कुछ वायरल शब्दों को पकड़कर मेवात को पिछड़ा घोषित कर दिया जाता है। एंकर ने दावा किया कि उन्होंने मेवातियों को बुचड़खानों के लिए पंचायत करते देखा है। लेकिन शायद उन्होंने वह संघर्ष नहीं देखा जब मेवात के लोग जिले की मांग के लिए लड़ रहे थे।

संस्कृति और भाईचारे की मिसाल

मेवात सिर्फ एक जिला नहीं, एक गौरवशाली संस्कृति है। यह ब्रज नगरी का अहम हिस्सा है। यहां आज भी महाभारत को मेवाती भाषा में गाया जाता है। मेवाती गायकी घराना संगीत की दुनिया में एक बड़ा नाम है। सुलक्षणा पंडित से लेकर आज के दौर के कलाकार सलमान खान इसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

जिस इलाके को गौ-तस्करी के नाम पर बदनाम किया जाता है, वहां के लगभग हर घर में गाय है। यहां की एक बड़ी आबादी गाय का दूध बेचकर अपना गुजारा करती है। मेवात की तहजीब में भाईचारा और प्रेम रसा-बसा है। इसे बदलने की कोशिशें पहले भी हुईं और अब भी जारी हैं।

पत्रकारिता की नैतिकता और जिम्मेदारी

एक पत्रकार का काम सच को उसके मूल स्वरूप में दिखाना होता है। लेकिन जब पत्रकार खुद एक एजेंडे का हिस्सा बन जाए, तो नुकसान पूरे समाज का होता है। मेवात बदल रहा है। पिछले पच्चीस सालों में इसकी सूरत और सीरत दोनों में बदलाव आया है। सड़कों का जाल बिछा है। शिक्षा की लौ जली है।

सिर्फ मशहूर होने के लिए या चंद लाइक्स के लिए किसी क्षेत्र की गलत तस्वीर पेश करना अनैतिक है। मेवात की असलियत उन गड्ढों में नहीं, बल्कि उन उड़ानों में है जो यहां की बेटियां आज भर रही हैं। अगली बार जब कोई कैमरा लेकर मेवात आए, तो उसे यहां की सड़कों की धूल के बजाय उन लोगों की आंखों की चमक देखनी चाहिए जो अपनी मेहनत से नया इतिहास लिख रहे हैं।