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दुबई में चमकेगी अमीराती सिनेमा की रोशनी

दुबई:

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं होता। कई बार वह किसी समाज की आत्मा बन जाता है। उसकी यादें, संघर्ष, रिश्ते और बदलती पहचान को पर्दे पर उतारता है। संयुक्त अरब अमीरात में इस हफ्ते कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। दुबई का मशहूर सिनेमा स्पेस ‘सिनेमा अकील’ तीन रातों तक अमीराती कहानियों का जश्न मनाने वाला है। यह सिर्फ फिल्मों की स्क्रीनिंग नहीं होगी, बल्कि यूएई की बदलती सांस्कृतिक पहचान को समझने का एक मौका भी होगी।

19 मई से 21 मई तक दुबई के अलसरकल एवेन्यू स्थित सिनेमा अकील में “एमिराती सिनेमा नाइट्स” का आयोजन किया जा रहा है। तीन दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में दस अमीराती फिल्मों को दिखाया जाएगा। इन फिल्मों में दुख, यादें, पहचान, रिश्ते, संघर्ष और रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी छोटी परतें दिखाई देंगी।

यह आयोजन एक खास संदेश भी देता है। अमीराती सिनेमा अब शुरुआती दौर में नहीं है। वह धीरे धीरे अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। स्थानीय फिल्मकार अब अपनी कहानियां अपने नजरिए से कह रहे हैं। बिना किसी बनावट के। बिना बाहरी नजर के दबाव के।

इस फिल्म समारोह का सबसे ज्यादा इंतजार जिस फिल्म को लेकर है, वह है ‘बाब’। यह फिल्म अमीरात की पहली महिला पटकथा लेखिका, निर्देशक और निर्माता नायला अल खाजा की दूसरी फीचर फिल्म है। खास बात यह भी है कि फिल्म का संगीत भारत के मशहूर संगीतकार ए आर रहमान ने दिया है।

रास अल खैमाह के दूरदराज पहाड़ी इलाके में आधारित यह फिल्म एक ऐसी महिला की कहानी कहती है, जो अपनी जुड़वां बहन को खोने के दर्द से गुजर रही है। लेकिन यह सिर्फ शोक की कहानी नहीं है। यह यादों, कल्पनाओं और भावनाओं की एक गहरी यात्रा बन जाती है। फिल्म पहले ही इतिहास रच चुकी है। यह किसी महिला निर्देशक की पहली अमीराती फीचर फिल्म बनी, जिसका प्रीमियर काहिरा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में हुआ।

नायला अल खाजा का काम लंबे समय से चर्चा में रहा है। उन्होंने ऐसे समय में फिल्म निर्देशन शुरू किया जब खाड़ी क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी इस क्षेत्र में बहुत कम थी। आज उन्हें यूएई के सिनेमा जगत की मजबूत आवाज माना जाता है।

इस कार्यक्रम में एक और अहम नाम है नुजूम अलघानम। वह सिर्फ फिल्मकार नहीं, बल्कि पुरस्कार विजेता कवयित्री भी हैं। अमीराती समाज और महिलाओं की कहानियों को बेहद संवेदनशील ढंग से पर्दे पर लाने के लिए उन्हें जाना जाता है।

उनकी फिल्म ‘नियरबाय स्काई’ भी इस आयोजन का हिस्सा होगी। यह फिल्म यूएई की पहली ऐसी महिला की कहानी दिखाती है, जिसने ऊंटों की सुंदरता प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। यह दुनिया आमतौर पर पुरुषों के दबदबे वाली मानी जाती है। लेकिन फिल्म दिखाती है कि एक महिला कैसे चुपचाप अपनी जगह बनाती है। बिना शोर मचाए। बिना हार माने।

नुजूम अलघानम की दूसरी फिल्म ‘शार्प टूल्स’ भी दिखाई जाएगी। यह अमीराती कलाकार हसन शरीफ के जीवन के अंतिम दिनों पर आधारित एक बेहद निजी और भावनात्मक फिल्म है। इसमें कला, अकेलापन और समय की गहरी छाप दिखाई देती है। यह सिर्फ एक डॉक्यूमेंट्री नहीं लगती। बल्कि कविता की तरह महसूस होती है।

फिल्म समारोह में कई और युवा और उभरते फिल्मकारों की रचनाएं भी शामिल हैं। इनमें माजिद अल अंसारी की ‘होबा’, सईद राशिद की ‘हीन’, फराह अल कासिमी की ‘मदर ऑफ फॉग’, सारा अल हद्दाद की ‘अ स्मॉल ड्रीम’, असवा तोमर की ‘स्टिलनेस एंड हराका’ और सारा मलहाश्मी की दिलचस्प शीर्षक वाली फिल्म ‘व्हाई इज माय ग्रैंडफादर्स बेड इन द लिविंग रूम?’ शामिल हैं।

इन फिल्मों के विषय अलग अलग हैं। कहीं परिवार की खामोशी है। कहीं यादों का बोझ। कहीं बदलती पहचान का सवाल। कहीं रोजमर्रा की जिंदगी के ऐसे छोटे पल, जिन पर अक्सर किसी की नजर नहीं जाती। लेकिन यही बातें इन फिल्मों को खास बनाती हैं।

दिलचस्प यह भी है कि अमीराती फिल्में अब सिर्फ स्थानीय दर्शकों तक सीमित नहीं रहीं। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में इन्हें सराहना मिल रही है। कई फिल्में पुरस्कार जीत चुकी हैं। इससे यह साफ दिखता है कि यूएई का फिल्म उद्योग अब सिर्फ बड़े बजट या ग्लैमरस छवि तक सीमित नहीं है। यहां अब गंभीर और गहरे विषयों पर भी काम हो रहा है।

दुबई को अक्सर ऊंची इमारतों, लक्जरी जिंदगी और कारोबार के शहर के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस शहर का एक सांस्कृतिक चेहरा भी है। अलसरकल एवेन्यू जैसे स्थानों ने कला, साहित्य और सिनेमा को नई जगह दी है। सिनेमा अकील उसी बदलाव की पहचान बन चुका है। यहां दुनिया भर की स्वतंत्र और वैकल्पिक फिल्मों को मंच मिलता है।

“एमिराती सिनेमा नाइट्स” जैसे आयोजन यह भी दिखाते हैं कि यूएई अपने समाज की कहानियों को खुद लिखना चाहता है। अब वह सिर्फ बाहरी नजर से दिखाई गई छवि पर निर्भर नहीं रहना चाहता।

सिनेमा की ताकत यही होती है। वह हमें किसी जगह को सिर्फ देखने नहीं, महसूस करने का मौका देता है।

इन तीन रातों में पर्दे पर सिर्फ फिल्में नहीं चलेंगी। यूएई की बदलती सोच, उसकी संस्कृति और लोगों की निजी दुनिया भी सामने आएगी। शायद यही वजह है कि यह आयोजन एक फिल्म महोत्सव से कहीं ज्यादा मायने रखता है। यह उन आवाजों का जश्न है, जो अब पहले से ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपनी कहानी कह रही हैं।

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