भायंदर हमला: मानसिक विक्षिप्तता या गहरी साजिश? मीडिया के ‘उत्तेजक’ रवैये पर उठे सवाल
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो/मुंबई/कोलकाता:
एक तरफ पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का महापर्व अपने अंतिम चरण में है, जहाँ ममता बनर्जी ‘मां, माटी, मानुष’ के नारों के साथ नफरत की राजनीति को शिकस्त देने का दावा कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र के मीरा-भायंदर से आई एक घटना ने देश के मीडिया जगत की नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना जितनी आपराधिक है, उससे कहीं अधिक डरावना इसे पेश करने का मीडिया का वह अंदाज़ा है, जो सीधा-साधा ‘आग में घी’ डालने जैसा प्रतीत हो रहा है।
भायंदर की घटना: सच क्या है?
सोमवार तड़के मीरा-भायंदर के नया नगर इलाके में एक निर्माणाधीन इमारत के पास तैनात दो सुरक्षा गार्डों पर हमला हुआ। पुलिस के अनुसार, 31 वर्षीय जैब जुबेर अंसारी ने गार्ड राजकुमार मिश्रा और सुब्रतो सेन पर चाकू से हमला किया। आरोप है कि उसने गार्डों को ‘कलमा’ पढ़ने के लिए मजबूर किया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सीसीटीवी की मदद से डेढ़ घंटे के भीतर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
लेकिन, असली सवाल घटना के बाद शुरू हुआ। क्या यह एक विक्षिप्त दिमाग की करतूत थी या कोई सोची-समझी साजिश? आरोपी जैब अंसारी अमेरिका से पढ़ा हुआ है और ऑनलाइन ट्यूटर के रूप में बच्चों को केमिस्ट्री और गणित पढ़ाता था। अचानक एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति चाकू लेकर किसी गार्ड को कलमा पढ़ाने क्यों जाएगा? क्या यह ‘लोन वुल्फ अटैक’ की कोई नई शैली है या फिर मानसिक अस्थिरता का परिणाम?
मीडिया की भूमिका: खबर या जहर?
मुख्यधारा के मीडिया, विशेषकर ‘आजतक’ जैसे बड़े चैनलों ने जिस तरह से इस खबर को ‘पहलगाम’ की आतंकी घटना से जोड़कर पेश किया, उसने पत्रकारिता के धर्म पर कालिख पोतने का काम किया है। पहलगाम में क्या हुआ था, वह अभी तक पूरी तरह पुष्ट नहीं है, लेकिन मीडिया ने भायंदर की घटना को उसी सांचे में ढालने की कोशिश की।
हद तो तब हो गई जब चैनल पर यह सवाल उठाया गया कि “दुनिया में 200 करोड़ मुसलमान हैं और कितने को कलमा पढ़ने आता है।” इस तरह के सांप्रदायिक और अपमानजनक सवालों के जरिए मीडिया क्या साबित करना चाहता है? क्या एक व्यक्ति के अपराध की सजा पूरी कौम को मानसिक रूप से प्रताड़ित करके दी जाएगी?
साजिश बनाम विक्षिप्तता: फडणवीस का बयान और जांच की दिशा
महाराष्ट्र के गृहमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि आरोपी के पास से संदिग्ध सामग्री मिली है और वह अमेरिका में रह चुका है। पुलिस अब ‘नेटवर्क’ की तलाश कर रही है। लेकिन क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति वाकई शिक्षित है और अचानक इस तरह की हरकत करता है, तो क्या उसके पीछे की मानसिक अवस्था की जांच नहीं होनी चाहिए?
मीडिया ने बिना जांच पूरी हुए ही उसे ‘आतंकी’ ढांचे में फिट कर दिया। यही वह खतरनाक प्रवृत्ति है जिसके खिलाफ ममता बनर्जी बंगाल में लड़ रही हैं। वह जानती हैं कि एक बार अगर नफरत की आग लग गई, तो उसे बुझाना मुश्किल होगा। भायंदर के स्थानीय लोगों ने शांति बनाए रखी, जो इस बात का सबूत है कि आम जनता मीडिया के उकसावे में नहीं आना चाहती।
बंगाल के चुनाव और मुस्लिम विरोधी नैरेटिव
आज बंगाल में दूसरे चरण की वोटिंग हो रही है। भवानीपुर से लेकर कोलकाता पोर्ट तक, भाजपा ने मुस्लिम विरोधी नैरेटिव बनाने की पूरी कोशिश की है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य नेताओं ने बंगाल में कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए, जबकि हकीकत यह है कि यूपी जैसे राज्यों में ‘क्राइम फ्री’ होने का दावा खुद ही सवालों के घेरे में है।
बंगाल के लोग आज बीजेपी से पूछ रहे हैं कि केंद्र में 13 साल रहने के बावजूद उन्होंने कितने बंगालियों को नौकरी दी? जब मीडिया भायंदर की घटना को उछालकर बंगाल के मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करता है, तो जनता समझ जाती है कि यह सब चुनाव जीतने का हथकंडा है। ममता बनर्जी की ‘सबका साथ’ वाली राजनीति ही इस सांप्रदायिक नैरेटिव का एकमात्र काट है।
▪️देखिए दुनिया की कुल आबादी का कितने प्रतिशत हिस्सा इस्लाम धर्म को मानता है
— AajTak (@aajtak) April 28, 2026
▪️कहां और कितने मुसलमान कलमा पढ़ना जानते हैं?
▪️मीरा भायंदर की घटना के बाद गूगल पर ‘कलमा’ सर्च बढ़ा
▪️इस्लाम में मुख्य रूप से छह (6) कलमे हैं, देखिए #BlackAndWhiteOnAajTak #MumbaiNews #MiraRoadCase… pic.twitter.com/wzujalSfrN
संयम की आवश्यकता
भायंदर की घटना दुखद है और गार्ड राजकुमार मिश्रा पर हुआ हमला निंदनीय है। आरोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। लेकिन, एक व्यक्ति के अपराध को पूरी कौम की ‘मानसिकता’ बताना पत्रकारिता नहीं, बल्कि प्रचार (Propaganda) है।
आज जब देश विभाजनकारी ताकतों के बीच खड़ा है, तब हमें ममता बनर्जी जैसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो यह कह सके कि “इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।” मीडिया को ‘आजतक’ जैसे चैनलों के बजाय तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग करनी चाहिए, न कि ऐसी बातें जिससे समाज में वैमनस्य फैले।
भायंदर की जांच अभी जारी है, लेकिन मीडिया ने अपना फैसला सुना दिया है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक है। बंगाल के मतदाता आज अपनी उंगली पर स्याही लगवाकर इसी ‘नफरत की राजनीति’ को विदा करने का संकल्प ले रहे हैं।
संपादकीय टिप्पणी: मुस्लिम नाउ हमेशा शांति और सद्भाव की अपील करता है। किसी भी घटना को मजहबी चश्मे से देखने के बजाय मानवीय आधार पर देखना ही सच्ची देशभक्ति है।

