खामेनेई की हत्या के बाद अहमदीनेजाद को लाने की थी साजिश !
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
ईरान को लेकर एक नई और बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। दावा किया गया है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान में सत्ता परिवर्तन की एक बड़ी योजना तैयार की थी। इस कथित योजना का मकसद था ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को फिर से सत्ता में लाना। यह दावा एक रिपोर्ट में किया गया है, जिसने पश्चिम एशिया की राजनीति को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, यह योजना उस स्थिति के लिए बनाई गई थी जब ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई पर हमले के बाद सत्ता का बड़ा खालीपन पैदा हो। कहा गया कि उस समय अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान दिया था कि बेहतर होगा अगर ईरान में “अंदर से कोई” नेतृत्व संभाले।
यहीं से कथित तौर पर एक ऐसे चेहरे की तलाश शुरू हुई जो ईरानी व्यवस्था को समझता हो, सत्ता का अनुभव रखता हो और मौजूदा धार्मिक नेतृत्व से टकराव में भी रहा हो। इस चर्चा के केंद्र में आया नाम था महमूद अहमदीनेजाद का।
एक समय पश्चिमी देशों और इजरायल के कट्टर आलोचक माने जाने वाले अहमदीनेजाद का नाम इस कथित योजना से जुड़ना कई लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है। क्योंकि अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान वह अक्सर अमेरिका और इजरायल के खिलाफ तीखे बयान देते रहे थे। वर्ष 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे अहमदीनेजाद ने खुद को कट्टर राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित किया था।
लेकिन हाल के वर्षों में उनकी राह ईरान की मौजूदा सत्ता व्यवस्था से अलग होती दिखी। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि धार्मिक नेतृत्व से मतभेद बढ़ने के बाद उन्हें तेहरान में नजरबंद जैसी स्थिति में रखा गया था। यही वजह रही कि उन्हें “भीतर के व्यक्ति” के रूप में देखा गया, जो सत्ता में बदलाव की स्थिति में एक नए चेहरे के तौर पर सामने आ सकते थे।
रिपोर्ट में एक और बड़ा दावा किया गया है। कहा गया कि युद्ध के शुरुआती दिनों में इजरायल ने अहमदीनेजाद के घर को निशाना बनाया। हालांकि यह हमला उन्हें खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि कथित तौर पर उन्हें बाहर निकालने के मकसद से किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस कार्रवाई का उद्देश्य उन सुरक्षा कर्मियों को हटाना था जो उनकी निगरानी कर रहे थे।
अहमदीनेजाद इस हमले में बच गए। लेकिन बाद में कथित तौर पर पूरी योजना से निराश हो गए। उनके एक करीबी सहयोगी के हवाले से कहा गया कि वॉशिंगटन उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देख रहा था जो ईरान की राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य स्थिति को संभाल सकता है।
हालांकि इस पूरे मामले को लेकर कई सवाल भी बने हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अहमदीनेजाद वास्तव में इस कथित योजना का हिस्सा बनने को तैयार थे। या फिर उनका नाम केवल संभावित विकल्प के तौर पर चर्चा में था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अहमदीनेजाद ने कुछ समय पहले हंगरी और ग्वाटेमाला की यात्राएं की थीं। इन यात्राओं को कुछ विश्लेषकों ने पश्चिमी देशों और इजरायल से अप्रत्यक्ष संपर्क के संकेत के रूप में देखा। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
इस बीच अमेरिका की ओर से “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नामक सैन्य अभियान को लेकर भी बयान सामने आए। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने कहा कि अभियान का उद्देश्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को कमजोर करना, सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाना और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना था। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमताओं को स्थायी रूप से रोकना है।
हालांकि कथित सत्ता परिवर्तन की यह योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि युद्ध और हमलों के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह नहीं टूटी। इससे यह संकेत मिला कि बाहरी आकलनों ने शायद ईरान की संस्थागत ताकत को कम करके आंका था।
कहा जा रहा है कि योजना तीन चरणों में ईरानी शासन को कमजोर करने पर आधारित थी। लेकिन अपेक्षित राजनीतिक उथल पुथल नहीं हुई। इसके बाद रणनीति को लेकर भी कई स्तर पर पुनर्विचार की चर्चा शुरू हो गई।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कथित हमले के बाद से महमूद अहमदीनेजाद सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं। उनकी मौजूदा स्थिति और ठिकाने को लेकर अलग अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर कुछ स्पष्ट नहीं है।
फिलहाल यह पूरा मामला दावों और रिपोर्टों के दायरे में है। कई बातें अब भी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुई हैं। लेकिन अगर इन दावों में सच्चाई का एक हिस्सा भी सामने आता है, तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति का सबसे बड़ा भूचाल साबित हो सकता है। एक ऐसा भूचाल, जिसमें दुश्मन और सहयोगी की परिभाषाएं भी बदलती नजर आ सकती हैं।

