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संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी: अरब और मुस्लिम देशों में गहराया भीषण भूख संकट

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

दुनिया के कई हिस्सों में इस समय भुखमरी और गरीबी के हालात बहुत ज्यादा बिगड़ चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक नई और बेहद डरावनी रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक अरब और मुस्लिम देशों में रहने वाले करोड़ों लोग इस समय भीषण खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के दो सबसे बड़े संगठनों ने मिलकर यह हंगर हॉटस्पॉट रिपोर्ट जारी की है। इसमें विश्व खाद्य कार्यक्रम और खाद्य एवं कृषि संगठन शामिल हैं। इस साझा रिपोर्ट में साफ तौर पर चेतावनी दी गई है। अगर समय रहते बड़े कदम नहीं उठाए गए तो दुनिया के कई देशों में बड़े पैमाने पर मौतें हो सकती हैं। भुखमरी का यह संकट तेजी से पैर पसार रहा है।

इस नई रिपोर्ट में फिलिस्तीन के गाजा क्षेत्र, यमन और सूडान को सबसे खतरनाक स्तर पर रखा गया है। इन जगहों पर हालात काबू से बाहर हो चुके हैं। इसके साथ ही इस बार इतिहास में पहली बार लेबनान को भी इस गंभीर सूची में शामिल किया गया है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस रिपोर्ट के सबसे डरावने आंकड़ों को दुनिया के सामने रखा है। उनका कहना है कि युद्ध, आर्थिक झटके और जलवायु परिवर्तन इस संकट के मुख्य कारण हैं।

युद्ध और हिंसा बने भुखमरी का सबसे बड़ा कारण

विश्व खाद्य कार्यक्रम के एक वरिष्ठ अधिकारी जीन मार्टिन बाउर ने इस स्थिति पर विस्तार से बात की है। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में फैली हिंसा और युद्ध ही इस भूख संकट का सबसे बड़ा कारण हैं। रिपोर्ट में जिन 13 सबसे संवेदनशील हॉटस्पॉट देशों की पहचान की गई है, उनमें से 12 देशों में भूख का असली कारण सिर्फ युद्ध है।

युद्ध की वजह से लोगों की पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है। उनका कामकाज छिन जाता है। हिंसा के डर से लोगों को अपना घर और गांव छोड़कर भागना पड़ता है। युद्ध के मैदानों में स्थानीय बाजार पूरी तरह बंद हो जाते हैं। सड़कों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि युद्ध वाले इलाकों में फंसे आम लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाना लगभग असंभव हो जाता है। इसी वजह से गाजा और सूडान जैसे इलाकों में स्थिति बदतर होती जा रही है।

पहली बार लेबनान संकट की सूची में शामिल

इस साल की रिपोर्ट में लेबनान का शामिल होना सबसे ज्यादा चिंताजनक माना जा रहा है। लेबनान में पिछले कुछ समय से आर्थिक उथल-पुथल मची हुई है। देश के दक्षिणी हिस्से में जारी सैन्य संघर्ष ने स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ दिया है। इस वजह से देश के भीतर ही लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। उन्हें अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहना पड़ रहा है।

लेबनान के स्थानीय बाजारों में खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं। वहां की मुद्रा का मूल्य लगातार गिर रहा है। जब लोग अपना घर छोड़कर भागते हैं, तो उनके पास पैसे और भोजन का कोई साधन नहीं बचता। स्थानीय बाजारों पर इसका बहुत बुरा दबाव पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि वे लेबनान में जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वहां की लगातार बदलती स्थिति और फंड की कमी के कारण राहत कार्य में बड़ी बाधा आ रही है। पिछले कुछ हफ्तों में लेबनान के आम लोगों की स्थिति बहुत ज्यादा कमजोर हुई है।

इन चार क्षेत्रों में अकाल का सबसे बड़ा खतरा

संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट का सबसे डरावना पहलू अकाल का खतरा है। रिपोर्ट में चार ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है जहां इस साल अकाल पड़ने की पूरी संभावना है। इन क्षेत्रों में सूडान, दक्षिण सूडान, गाजा और सोमालिया शामिल हैं। गाजा पट्टी में पिछले कुछ समय से जारी संघर्ष विराम की वजह से स्थिति में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है। लेकिन वहां की जमीनी हकीकत आज भी बेहद नाजुक बनी हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरा संकट ऐसा नहीं है जिसे रोका न जा सके। इसके बारे में पहले से ही अंदाजा लगाया जा सकता था। दुनिया के अमीर देश चाहें तो अब भी इन मासूम लोगों की जान बचा सकते हैं। लेकिन इसके लिए कार्रवाई करने का समय बहुत तेजी से हाथ से निकल रहा है। अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तुरंत कदम नहीं उठाए तो आने वाले दिन बेहद खौफनाक हो सकते हैं।

मानवीय सहायता के बजट में आई ऐतिहासिक गिरावट

एक तरफ दुनिया भर में भूख से बेहाल लोगों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। वहीं दूसरी तरफ इन लोगों की मदद के लिए मिलने वाले फंड में भारी कटौती की गई है। खाद्य एवं कृषि संगठन के निदेशक रेन पॉलसन ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली मानवीय सहायता का बजट बहुत कम हो गया है।

साल 2025 और 2026 के दौरान खाद्य सुरक्षा के लिए मिलने वाला फंड इतना कम हो चुका है, जितना आखिरी बार साल 2016 और 2017 में देखा गया था। यह स्थिति तब है जब पिछले दस सालों में दुनिया भर में भूखे लोगों की आबादी पहले से दोगुनी हो चुकी है। फंड की इस भारी कमी की वजह से राहत एजेंसियों को बहुत कठिन फैसले लेने पड़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र को अपनी निगरानी और जांच के काम बंद करने पड़ रहे हैं। डेटा की कमी के कारण यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि किस इलाके को पहले मदद भेजी जाए।

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का वैश्विक असर

इस पूरे संकट के पीछे एक और बड़ा कारण इरान के आसपास जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का एक ऐसा समुद्री मार्ग है जहां से पूरी दुनिया के कुल तेल की सप्लाई का एक चौथाई हिस्सा गुजरता है। इसके अलावा दुनिया भर में होने वाले खाद यानी फर्टिलाइजर के कुल व्यापार का एक तिहाई हिस्सा भी इसी रास्ते से होकर जाता है।

इरान युद्ध के कारण इस समुद्री रास्ते में बड़ी रुकावटें आई हैं। इस नाकेबंदी की वजह से वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। खाद महंगी होने के कारण गरीब देशों में खेती की लागत बहुत बढ़ गई है। जहाजों के परिवहन का किराया और उनका बीमा भी महंगा हो गया है। यह सब चीजें सीधे तौर पर आम जनता के खाने-पीने की चीजों को महंगा बना रही हैं। इसके कारण संयुक्त राष्ट्र के लिए राहत सामग्री खरीदना और उसे जहाजों के जरिए दूसरे देशों तक भेजना भी बहुत ज्यादा खर्चीला हो गया है।

सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देश

होर्मुज जलमार्ग के बंद होने और वैश्विक आर्थिक झटकों का सबसे बुरा असर उन देशों पर पड़ा है जो पहले से ही कमजोर थे। मध्य पूर्व और अफ्रीका के कई देश इसके सीधे शिकार बने हैं।

  • सूडान में जारी आंतरिक युद्ध ने कृषि को पूरी तरह ठप कर दिया है।
  • फिलिस्तीन के गाजा में बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो चुका है और लोग पूरी तरह विदेशी मदद पर निर्भर हैं।
  • लेबनान अपनी खराब अर्थव्यवस्था और युद्ध के दोहरे मोर्चे से लड़ रहा है।
  • यमन में पिछले कई सालों से जारी संकट अब भूख के सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
  • सीरिया में भी लंबे समय से चल रहे संघर्ष के कारण घरेलू खाद्य उत्पादन लगभग खत्म होने की कगार पर है।

इन सभी देशों में स्थानीय स्तर पर अनाज का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। ऊपर से अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती ने इनकी कमर तोड़ दी है।

निष्कर्ष: क्या है इस महासंकट का समाधान?

संयुक्त राष्ट्र का साफ कहना है कि इन देशों में दिखने वाले बुरे परिणाम कोई किस्मत का खेल नहीं हैं। इन्हें इंसानों की गलतियों ने पैदा किया है और इंसान ही इन्हें ठीक कर सकते हैं। इस भूख संकट को खत्म करने के लिए दुनिया के बड़े नेताओं को राजनीतिक प्रतिबद्धता दिखानी होगी। कूटनीति के जरिए युद्धों को तुरंत रोकना होगा।

जब तक युद्ध बंद नहीं होंगे, तब तक इन देशों में खेतों में अनाज नहीं उगाया जा सकेगा। वैश्विक मंचों पर भूख और भुखमरी के इस मुद्दे को सबसे ऊपर रखना होगा। अमीर देशों को आगे आकर अपनी फंडिंग बढ़ानी होगी। तभी करोड़ों मासूम बच्चों और परिवारों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है। समय बहुत कम है और पूरी दुनिया की नजरें अब वैश्विक ताकतों के फैसलों पर टिकी हैं।