Uttar pradesh muslims success story : रूबीना राशिद से अलीगढ़ की महिलाओं की नई पहचान
मुस्लिम नाउ विशेष | अलीगढ़

अलीगढ़ की पुरानी गलियों में एक ऐसी दुनिया बसती है, जहाँ सुई और धागा सिर्फ कपड़े नहीं सजाते, बल्कि जिंदगी को नए रंग देते हैं। यहां फूल पत्ती की कढ़ाई केवल एक कला नहीं, बल्कि कई महिलाओं की पहचान और उम्मीद बन चुकी है। इस बदलाव के केंद्र में हैं रूबीना राशिद अली, जिन्होंने एक पुरानी विरासत को नया रास्ता दिया है।
फूल पत्ती नाम सुनने में जितना नर्म लगता है, उसका काम उतना ही महीन और धैर्य मांगने वाला है। कपड़े के छोटे छोटे टुकड़ों को काटकर, मोड़कर और सलीके से सिलकर फूलों और पत्तियों का आकार दिया जाता है। फिर उन पर बेहद बारीक कढ़ाई होती है। यह कला देखने में सरल लगती है, लेकिन इसे गढ़ने में बरसों का अभ्यास लगता है।
अलीगढ़ में यह काम लंबे समय से महिलाओं के हाथों में रहा है। मगर विडंबना यह रही कि इस हुनर की असली मालिक महिलाएं कभी उसका पूरा लाभ नहीं पा सकीं। मेहनत उनके हिस्से आई और मुनाफा अक्सर बिचौलियों के पास चला गया।
रूबीना राशिद अली ने इसी दर्द को करीब से देखा।
वह कहती हैं, “असली कलाकार महिलाएं थीं, लेकिन पहचान और कमाई किसी और के हिस्से में जाती थी। मैंने सोचा कि यह बदलना चाहिए।”
रूबीना का जन्म लखनऊ में हुआ। उनके पिता अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बायोकेमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। मां सादगी भरा घरेलू जीवन जीने वाली महिला थीं। बचपन से ही रूबीना का मन रचनात्मक चीजों में लगता था। आसपास की महिलाओं को कढ़ाई करते देखना, शादी के जोड़ों की बारीक डिज़ाइन निहारना, धीरे धीरे उनके भीतर इस कला के लिए लगाव पैदा करता गया।
आगे चलकर उन्होंने नई दिल्ली से विज्ञापन और संचार प्रबंधन में पढ़ाई की। फिर शादी हुई, बच्चे हुए और नौकरी की जिम्मेदारियां आईं। लेकिन सुई और धागे से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा।
साल 2019 उनके जीवन में बड़ा मोड़ लेकर आया। पिता के निधन के बाद उन्होंने तय किया कि फूल पत्ती की यह कला सिर्फ शौक नहीं रहेगी। इसे महिलाओं की आर्थिक ताकत बनाया जाएगा।
आज रूबीना अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाणिज्य विभाग में अनुभाग अधिकारी हैं। नौकरी, घर और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने फूल पत्ती को नई पहचान दिलाने का काम शुरू किया।
उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया। इंस्टाग्राम के जरिए अपने डिज़ाइन लोगों तक पहुंचाए। ऑनलाइन ऑर्डर लेने शुरू किए। फिर धीरे धीरे दूसरी महिलाओं को भी इस काम से जोड़ा।
आज करीब 100 महिलाएं उनके साथ काम कर रही हैं।
रूबीना सिर्फ कढ़ाई नहीं सिखातीं। वह यह भी समझाती हैं कि अपने हुनर की सही कीमत कैसे तय की जाए। काम को कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर बांटा गया है ताकि महिलाओं की नियमित आमदनी बनी रहे।
उनके डिज़ाइन अब अलीगढ़ तक सीमित नहीं हैं। दिल्ली हाट, कोलकाता, बेंगलुरु, राजस्थान और कोटा जैसे शहरों में प्रदर्शनियां लग चुकी हैं। हर जगह लोगों ने फूल पत्ती की बारीकी और खूबसूरती को सराहा।
रूबीना ने इस पारंपरिक कला को नए प्रयोगों से भी जोड़ा है। क्रोशिया, चिकनकारी, गोटा पट्टी और टाई एंड डाई जैसे कामों को फूल पत्ती के साथ मिलाकर उन्होंने इसे आधुनिक रूप दिया। अब यह सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं रही। होम डेकोर और लाइफस्टाइल उत्पादों में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है।
उनके साथ काम करने वाली एक महिला मुस्कुराते हुए कहती हैं, “पहले हम किसी और के लिए कढ़ाई करते थे। अब लोग हमारे काम को हमारे नाम से पहचानते हैं।”
रूबीना का सपना बड़ा है। वह चाहती हैं कि फूल पत्ती की कला स्कूलों और डिजाइन संस्थानों तक पहुंचे। अगली पीढ़ी इसे सीखे और यह परंपरा जिंदा रहे।
अलीगढ़ की गलियों से उठी यह बारीक कढ़ाई अब एक नई कहानी लिख रही है। यह सिर्फ धागों की कहानी नहीं। यह उन महिलाओं की आवाज़ है, जो अपने हुनर से अपनी पहचान बना रही हैं।

