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जंग के बीच नेतन्याहू यूएई में थे क्या ?

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, दुबई

पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नए दावे ने हलचल बढ़ा दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या ईरान के साथ युद्ध के सबसे तनावपूर्ण दौर में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू गुप्त रूप से संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे थे। क्या वहां उन्होंने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद से मुलाकात की थी। और क्या इस दौरान सुरक्षा और सैन्य सहयोग पर भी बातचीत हुई थी।

इन सवालों ने खाड़ी देशों में नई बहस छेड़ दी है। वजह यह है कि दावा खुद इजरायल की ओर से सामने आया, जबकि यूएई ने उसे पूरी तरह खारिज कर दिया है।

इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने बुधवार को दावा किया कि नेतन्याहू ने ईरान युद्ध के दौरान संयुक्त अरब अमीरात की एक गुप्त यात्रा की थी। बयान के अनुसार यह मुलाकात मार्च के आखिर में हुई और इसे दोनों देशों के रिश्तों में “ऐतिहासिक सफलता” बताया गया। इजरायल की ओर से कहा गया कि इस बैठक में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से चर्चा हुई।

लेकिन कुछ ही घंटों बाद यूएई ने इस दावे को सिरे से नकार दिया।

यूएई के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि नेतन्याहू की किसी यात्रा या किसी इजरायली सैन्य प्रतिनिधिमंडल के देश में आने की खबरें “पूरी तरह निराधार” हैं। मंत्रालय ने साफ कहा कि इजरायल के साथ उसके संबंध खुले और आधिकारिक हैं तथा वे 2020 के अब्राहम समझौते के ढांचे के तहत चलते हैं, किसी गुप्त व्यवस्था के आधार पर नहीं।

यही विरोधाभास अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।

एक ओर इजरायल का दावा है कि यात्रा हुई और वह रिश्तों में बड़ी प्रगति थी। दूसरी ओर यूएई कह रहा है कि ऐसी कोई यात्रा हुई ही नहीं। इससे सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सच क्या है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया अभी हाल की जंग के असर से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है। ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था। अमेरिका के सीधे समर्थन के बाद हालात और तनावपूर्ण हुए। इसी दौरान खाड़ी देशों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे।

ईरान पहले ही यूएई पर इजरायल और अमेरिका के साथ करीबी संबंध रखने का आरोप लगाता रहा है। तेहरान का कहना रहा है कि क्षेत्र में कुछ अरब देशों की नीतियां उसकी सुरक्षा के लिए खतरा बन रही हैं। हालिया संघर्ष के दौरान यूएई पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें भी सामने आई थीं।

दरअसल यूएई और इजरायल के रिश्तों में बड़ा बदलाव 2020 में आया था, जब अमेरिकी मध्यस्थता में दोनों देशों ने औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए। इसे अब्राहम समझौते के नाम से जाना जाता है। इसके बाद व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की नजदीकी बढ़ी।

हालांकि मुस्लिम दुनिया के एक बड़े हिस्से में इजरायल को लेकर नाराजगी बनी हुई है, खासकर गाजा युद्ध और फिलिस्तीन मुद्दे के कारण। ऐसे में नेतन्याहू की कथित गुप्त यात्रा की खबर ने सोशल मीडिया और अरब जगत में तेज प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। कई जगह सवाल उठ रहे हैं कि यदि यूएई और इजरायल के रिश्ते खुले हैं, तो फिर किसी गुप्त यात्रा की जरूरत क्यों पड़ी।

इस बीच एक और दावा भी चर्चा में है। कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में कहा गया कि ईरान युद्ध के दौरान इजरायल ने यूएई को सुरक्षा सहयोग दिया और आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम की मदद उपलब्ध कराई। कुछ रिपोर्टों में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि इजरायली सैन्य कर्मी भी इस व्यवस्था के संचालन में शामिल थे। हालांकि इस मुद्दे पर भी अलग अलग दावे सामने आए हैं और पूरी तस्वीर अब तक साफ नहीं है।

यही कारण है कि नेतन्याहू की कथित यात्रा की खबर ने विवाद को और बढ़ा दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि ऐसी मुलाकात हुई थी, तो उसका मकसद केवल कूटनीति नहीं हो सकता। पश्चिम एशिया में सुरक्षा व्यवस्था, ईरान का प्रभाव और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी बातचीत का हिस्सा रहे होंगे। लेकिन चूंकि यूएई आधिकारिक रूप से इस दावे को नकार रहा है, इसलिए इस पर कोई ठोस निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

दिलचस्प बात यह भी है कि यूएई ने सिर्फ यात्रा का ही खंडन नहीं किया, बल्कि मीडिया संस्थानों से “सत्यापित जानकारी” प्रकाशित करने की अपील भी की। यूएई का कहना है कि अपुष्ट दावों को फैलाना राजनीतिक भ्रम पैदा कर सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि पश्चिम एशिया की राजनीति कितनी जटिल हो चुकी है। यहां दोस्ती और दूरी दोनों अक्सर एक साथ दिखाई देती हैं। सार्वजनिक बयान कुछ और कहते हैं और कूटनीतिक चर्चाओं की तस्वीर कभी कभी अलग नजर आती है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू वास्तव में यूएई गए थे या नहीं। अभी तक इस सवाल का एकमत जवाब सामने नहीं आया है।

एक तरफ इजरायल का आधिकारिक दावा है। दूसरी तरफ यूएई का स्पष्ट खंडन। सच इन दोनों के बीच कहीं छिपा हो सकता है। या शायद आने वाले दिनों में कोई नया खुलासा इस विवाद की दिशा तय करे।

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