जब कानून का रक्षक ही नफ़रत फैलाए:असम में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ख़तरनाक संकेत
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नफ़रत जब सत्ता की भाषा बन जाए: असम में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी और उसके ख़तरनाक नतीजे
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली / गुवाहाटी
असम की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता, भाषा और नफ़रत के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। हाल ही में असम भारतीय जनता पार्टी द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया गया एक वीडियो—जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा राइफल से निशाना साधते और गोली चलाते दिखाई दे रहे थे—ने पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। वीडियो में जिन दो लोगों को निशाने पर दिखाया गया, उनमें से एक ने टोपी पहन रखी थी और दूसरे की दाढ़ी थी। कैप्शन था—“प्वाइंट ब्लैंक शॉट।” भले ही यह वीडियो बाद में हटा दिया गया हो, लेकिन जो संदेश दिया गया, वह साफ़ था—और बेहद ख़तरनाक भी।
राजनीतिक विश्लेषकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह वीडियो केवल एक प्रतीकात्मक हरकत नहीं थी, बल्कि अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश थी। असम में मुसलमानों को बार-बार “बांग्लादेशी” कहकर संबोधित किया जाना, उनकी नागरिक पहचान को संदिग्ध ठहराना और उन्हें सामाजिक-आर्थिक रूप से निशाना बनाना—यह सब अब महज़ बयानबाज़ी नहीं रह गया है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर इसके असर दिखने लगे हैं।
जब मुख्यमंत्री बोले, तो समाज सुनता है
हिमंत बिस्वा सरमा कोई साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं हैं। वे न तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, न विश्व हिंदू परिषद और न ही बजरंग दल के कोई साधारण सदस्य हैं। वे एक संवैधानिक पद पर बैठे मुख्यमंत्री हैं—ऐसे पद पर, जहां से निकले शब्द कानून व्यवस्था को लागू करने वालों और आम जनता—दोनों पर असर डालते हैं।
यही वजह है कि जब मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से “मिया” जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं या यह कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को “परेशान किया जाना चाहिए,” तो उसका असर महज़ भाषण तक सीमित नहीं रहता।
शब्दों से कर्म तक: एक डरावना उदाहरण
इसका एक ज़िंदा उदाहरण 27 जनवरी को सामने आया, जब एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर कहा कि बंगाली भाषी मुसलमानों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में परेशान किया जाना चाहिए—यहां तक कि रिक्शा का किराया भी कम दिया जाए, ताकि वे “असम छोड़ दें।” यह बयान अपने आप में नफ़रत फैलाने वाला था, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और भी चिंताजनक था।
तीन दिन बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक युवती ने एक मुस्लिम रिक्शा चालक को 20 रुपये के किराए के बदले सिर्फ़ 4 रुपये दिए। यह कोई छोटी घटना नहीं थी। यह इस बात का प्रमाण था कि सत्ता में बैठे व्यक्ति के शब्द कैसे आम लोगों के व्यवहार को दिशा देते हैं। यह नफ़रत का वह सिलसिला है, जो पहले आर्थिक भेदभाव से शुरू होता है और फिर शारीरिक हिंसा तक जा सकता है।
चुनाव और नफ़रत की राजनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि असम में होने वाले आगामी चुनाव इस पूरी बयानबाज़ी की पृष्ठभूमि में हैं। जब चुनाव नज़दीक आते हैं, तो ध्रुवीकरण की राजनीति तेज़ हो जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता हासिल करने के लिए समाज को बांटना जायज़ है?
असम बीजेपी द्वारा पोस्ट किया गया यह वीडियो संविधान की मूल भावना पर सीधा हमला माना जा रहा है। संविधान हर नागरिक को समान सुरक्षा, सम्मान और अधिकार की गारंटी देता है। लेकिन जब सत्ता पक्ष का मुख्यमंत्री ही एक समुदाय को संदेह के घेरे में खड़ा करे, तो यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सौहार्द के लिए गंभीर ख़तरा बन जाता है।
कानून और जवाबदेही का सवाल
कानूनी जानकारों का कहना है कि इस तरह के बयान और प्रतीकात्मक हिंसा भारतीय दंड कानूनों के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं। Supreme Court of India ने 2022 में स्पष्ट निर्देश दिया था कि नफ़रत भरे भाषणों पर पुलिस को स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रह गए हैं? या फिर सत्ता के दबाव में कानून लागू करने वाली एजेंसियां आंखें मूंदे बैठी हैं?
A video posted on the Assam BJP unit’s official X handle showing Chief Minister Himanta Biswa Sarma symbolically firing at “point-blank” range has sparked widespread condemnation. The clip combines footage of Sarma with AI-generated images and captions such as “foreigner free… pic.twitter.com/2s40m6wMSI
— The Siasat Daily (@TheSiasatDaily) February 8, 2026
‘प्लॉज़िबल डिनायबिलिटी’ की राजनीति
कानूनी विशेषज्ञ इसे “plausible deniability” कहते हैं—यानी ऐसा बयान देना, जिसे बाद में घुमा-फिराकर नकारा जा सके। जब कोई नेता कहता है कि “हम देशद्रोही मुसलमानों की बात कर रहे हैं,” तो वह यह दावा कर सकता है कि “जो देशद्रोही नहीं हैं, वे निशाने पर नहीं हैं।” लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि ऐसे बयान पूरे समुदाय को शक और नफ़रत के दायरे में डाल देते हैं।
प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की भूमिका
यह सवाल भी उठ रहा है कि जब इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चुप्पी क्यों है? खासकर तब, जब सत्तारूढ़ दल का नारा “सबका साथ, सबका विकास” है। क्या यह नारा सिर्फ़ चुनावी भाषणों तक सीमित है?
एक समाज, दो तस्वीरें
एक तरफ़ उत्तराखंड में “मोहम्मद दीपक” जैसे लोग हैं, जो नफ़रत के ख़िलाफ़ खड़े होकर एक मुस्लिम दुकानदार की रक्षा करते हैं। दूसरी तरफ़ असम में एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसी भाषा और प्रतीकों का इस्तेमाल करता है, जो समाज को तोड़ने का काम करते हैं। यही विरोधाभास आज के भारत की सबसे बड़ी चुनौती है।
अंतिम सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या नफ़रत फैलाने वाले सत्ता में बैठे लोग भी कानून के दायरे में आएंगे? अगर कार्यकर्ता और छात्र वर्षों तक कठोर क़ानूनों के तहत जेल में रह सकते हैं, तो क्या एक मुख्यमंत्री जवाबदेही से ऊपर है?
लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि क्या वह सबसे ताक़तवर व्यक्ति को भी कानून के कटघरे में खड़ा कर सकता है। असम की यह घटना केवल एक राज्य का मुद्दा नहीं है—यह पूरे देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक भविष्य से जुड़ा सवाल है।

