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कौन हैं शेख अबूबकर अहमद, जिनकी कोशिश से यमन में भारतीय नर्स की फांसी टली?

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, चेन्नई

16 जुलाई को यमन में केरल की नर्स निमिषा प्रिया को फांसी दी जानी थी। हत्या के एक मामले में दोषी करार दी गई निमिषा की ज़िंदगी अंतिम पलों में एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है। भारत के ग्रैंड मुफ़्ती शेख अबूबकर अहमद के प्रयासों से यह फांसी टाल दी गई। इस ख़बर के सामने आते ही सबके मन में एक ही सवाल उठने लगा—कौन हैं शेख अबूबकर अहमद, जिनकी कोशिशों से एक भारतीय महिला को जीवनदान मिला?

शेख अबूबकर अहमद, जिन्हें औपचारिक रूप से कंथापुरम ए. पी. अबूबकर मुसलियार के नाम से जाना जाता है, भारत के ग्रैंड मुफ़्ती और विश्व प्रसिद्ध सूफ़ी इस्लामी विद्वान हैं। उनका जीवन केवल धार्मिक शिक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवता की सेवा और सामाजिक उत्थान का प्रतीक है।


प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

1931 में केरल के कोझिकोड जिले में जन्मे शेख अबूबकर का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में शुरू हुआ। उनका पालन-पोषण एक गहरे धार्मिक वातावरण में हुआ, जिसने उन्हें इस्लाम की परंपरागत शिक्षा और आध्यात्मिक मूल्यों में प्रशिक्षित किया। बचपन से ही सेवा और त्याग की भावना उनके व्यक्तित्व में गहराई तक पैठ गई थी।

युवावस्था में उन्होंने पारंपरिक इस्लामी शिक्षा के साथ-साथ समाज की जरूरतों को समझते हुए आधुनिक दृष्टिकोण को भी अपनाया। धीरे-धीरे वे केवल एक धार्मिक मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रबल पैरोकार के रूप में उभरे।


सूफ़ी विचारधारा और मानवता की सेवा

शेख अबूबकर की पहचान सिर्फ़ एक धार्मिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में भी है जो सूफ़ी परंपरा के उस मूल मंत्र पर चलते हैं जिसे ‘खिदमत’ कहा जाता है—अर्थात् इंसानियत की सेवा। वे मानते हैं कि आध्यात्मिकता का असली उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि समाज की बेहतरी में योगदान देना है।

उनका जीवन इसी सिद्धांत का जीता-जागता उदाहरण है। यही कारण है कि वे भारत की विविधता को एक सुंदर पुष्पगुच्छ मानते हुए हमेशा साम्प्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के पक्षधर रहे।


शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति

शेख अबूबकर का सबसे बड़ा योगदान शिक्षा के क्षेत्र में माना जाता है। 1978 में उन्होंने केरल के कंथापुरम में जामिया मरकज़ की स्थापना की, जो आज इस्लामी और आधुनिक शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र है। यही नहीं, उन्होंने हजारों स्कूलों और कॉलेजों की नींव रखी। उनके द्वारा शुरू की गई शैक्षिक परियोजनाओं का आंकड़ा चौंकाने वाला है:

  • 12,232 प्राथमिक स्कूल
  • 11,010 सेकेंडरी स्कूल
  • 638 कॉलेज और ग्रेजुएट संस्थान

इन संस्थानों का उद्देश्य केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विज्ञान, तकनीक और अन्य आधुनिक विषयों को भी शामिल करना है, ताकि मदरसा शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। यह पहल भारत में मदरसा आधुनिकीकरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी मानी जाती है।


मानवता की सेवा का विस्तृत नेटवर्क

शेख अबूबकर की सामाजिक पहलों का दायरा शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने 1960 के दशक में 25 अनाथ बच्चों को गोद लेकर अपनी सेवा यात्रा की शुरुआत की थी। आज यह संख्या बढ़कर 18,745 अनाथ बच्चों तक पहुंच गई है जिन्हें आश्रय और शिक्षा प्रदान की गई है।

उनकी प्रमुख उपलब्धियां:

  • 72,500 पेयजल परियोजनाएँ, जिनसे 6,028 गांवों को लाभ मिला।
  • 16,937 परिवारों को मकान उपलब्ध कराए, जिन परियोजनाओं के नाम ‘इसकान’, ‘सदात भवन’ और ‘दारुल खैर’ रखे गए।
  • 4,675 स्वास्थ्य केंद्र और पेन एंड पैलिएटिव क्लीनिक स्थापित किए।
  • 50,000 से अधिक स्वयंसेवकों को स्वास्थ्य सेवा के लिए प्रशिक्षित किया।
  • 9,920 शौचालयों का निर्माण, ताकि स्वच्छता सुनिश्चित हो सके।
  • हर साल 3,00,000 जरूरतमंदों को कपड़े और प्रतिदिन 20,000 खाद्य किट का वितरण।

रोज़गार सृजन में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उनकी पहलों ने सीधे तौर पर 1,35,000 लोगों को नौकरी दी और 45,000 युवाओं को रोजगार कौशल में प्रशिक्षित किया।


महिला सशक्तिकरण और युवा उत्थान

उनकी नीतियों में महिलाओं को विशेष महत्व दिया गया है। उनकी संस्थाओं में कार्यरत आधे से ज्यादा कर्मचारी और छात्राएं महिलाएं हैं। इसके अलावा, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाया गया है।


आर्थिक दृष्टि और विकास मॉडल

शेख अबूबकर केवल धार्मिक नेता नहीं, बल्कि एक कुशल प्रबंधनकर्ता और दूरदर्शी योजनाकार भी हैं। 1970 के दशक में खाड़ी देशों में रोजगार के अवसर बढ़ने के बाद भारत में आए रेमिटेंस का उन्होंने सामाजिक विकास के लिए सही उपयोग किया। इससे केरल के कई पिछड़े इलाकों में आर्थिक विकास का नया मॉडल तैयार हुआ।

उनकी सबसे उल्लेखनीय परियोजनाओं में मारकज़ नॉलेज सिटी शामिल है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और आवास का आधुनिक संगम है।


राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रवक्ता

शेख अबूबकर ने हमेशा अंतरधार्मिक संवाद और राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। उन्होंने कई शांति सम्मेलनों का आयोजन किया और समाज में भाईचारे को मजबूत करने के लिए कार्य किया। उनका यह संदेश स्पष्ट है कि “धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि समरसता है।”


मदरसा शिक्षा में सुधार के अगुआ

भारतीय मदरसों में आधुनिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को शामिल करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। उन्होंने मदरसों को इस्लामी पहचान के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार बनाने का सपना साकार किया।


समापन

शेख अबूबकर अहमद का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक व्यक्ति, दृढ़ निश्चय और सेवाभाव से, लाखों ज़िंदगियों को बदल सकता है। निमिषा प्रिया को मिली राहत उनकी मानवीय संवेदनाओं का ताज़ा प्रमाण है। वे केवल धार्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय एकता के स्तंभ हैं।

उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—“सच्ची इबादत वही है जो इंसानियत की सेवा में झलके।