ईरान अमेरिका जंग के बाद बदलेगी दुनिया की सियास
मुस्लिम नाउ विशेष
पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार हामिद मीर ने हाल ही में अपने एक कार्यक्रम में बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि एक न एक दिन अमेरिका और ईरान के बीच का तनाव थमेगा। जब ऐसा होगा तब पूरी दुनिया का मंजर बदल जाएगा। ईरान पहले जैसा ईरान नहीं रहेगा और इजरायल पहले जैसा इजरायल नहीं रहेगा। सुपरपावर अमेरिका और यूएई समेत तमाम खाड़ी देशों की स्थिति भी वैसी नहीं रहेगी। भारत और पाकिस्तान के समीकरण भी पूरी तरह बदल जाएंगे। पहली बार में हामिद मीर की यह बात किसी गप जैसी लग सकती है। लेकिन अगर आप ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध और उसके बाद उभरते नए समीकरणों को देखें तो इस बात में गहरा दम नजर आता है।
मौजूदा दौर में मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व की भू-राजनीति में बहुत बड़ा उलटफेर हो रहा है। ईरान, चीन और रूस का एक नया त्रिकोण बनकर उभर रहा है। यह नया गठबंधन वैश्विक सत्ता के संतुलन को चुनौती दे रहा है। एक समय था जब वैश्विक मीडिया में मुसलमानों को आतंकवाद से जोड़कर एक खास नैरेटिव चलाया जाता था। आज वह पूरा नैरेटिव बदल चुका है। अब दुनिया भर में इजरायल की छवि एक आक्रामक और क्रूर देश के रूप में बन गई है। इजरायल आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगभग पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि जब ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर यानी युद्धविराम की बातचीत होती है तो इजरायल को उसमें शामिल तक नहीं किया जाता है। मुख्य पक्ष होने के बावजूद उसे हाशिए पर धकेल दिया गया है।
यही वजह है कि इजरायल अब दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए छटपटा रहा है। वह कभी सीजफायर के दौरान लेबनान पर बमबारी कर देता है तो कभी पुराने राज खोलने लगता है। हाल ही में इजरायल ने दावा किया कि जंग के दौरान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू गुपचुप तरीके से यूएई गए थे। इजरायल का कहना है कि उसने ईरान के ड्रोन हमलों से बचाने के लिए यूएई को अपना मशहूर आयरन डोम और आयरन बीम डिफेंस सिस्टम दिया था जो आज भी वहां तैनात है। इतना ही नहीं इजरायल ने यह भी खुलासा कर दिया कि सऊदी अरब ने अतीत में ईरान पर गुपचुप तरीके से हमला किया था। इजरायल की तरफ से ये सारे खुलासे ऐसे समय में किए जा रहे हैं जब ईरान और अमेरिका युद्ध को खत्म कर समझौते की तरफ बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो इजरायल अब इस बड़े खेल से लगभग बाहर हो चुका है। उसकी जिस सैन्य और खुफिया ताकत का लोहा पूरी दुनिया मानती थी उसकी हवा निकल चुकी है। ईरान के सस्ते ड्रोन और मिसाइलों ने इजरायल के अभेद्य माने जाने वाले सुरक्षा कवच को भेद दिया है। रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि इजरायल पिछले चालीस साल से अमेरिकी राष्ट्रपतियों को गुमराह करता आ रहा था। वह लगातार वाशिंगटन को यह समझा रहा था कि ईरान विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उसने परमाणु बम बना लिया है। पुराने अमेरिकी राष्ट्रपति इजरायल की इन बातों को उसकी रणनीति समझकर टालते रहे। लेकिन मौजूदा अमेरिकी प्रशासन इजरायल के बुने जाल में फंस गया।
अब इस बात का भी खुलासा हो चुका है कि ईरान पर सीधे हमले के लिए मोसाद और इजरायली सेना ने अमेरिकी नेतृत्व के सामने एक बकायदा प्रेजेंटेशन दिया था। इजरायल ने अमेरिका को भरोसा दिलाया था कि अगर ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडरों और नेताओं को मार दिया जाए तो वहां की जनता विद्रोह कर देगी। इसके बाद बड़ी आसानी से ईरान पर नियंत्रण पाया जा सकता है। लेकिन यह रणनीति पूरी तरह फेल साबित हुई। एक भारतीय सैन्य अधिकारी के मुताबिक ईरान उम्मीदों से बिल्कुल अलग निकला। जब इजरायल हमले की योजना बना रहा था तब ईरान चुपचाप उसका करारा जवाब देने की तैयारी कर रहा था।
जानकारों का कहना है कि ईरान की एक बड़ी आबादी जमीन के नीचे बने बंकरों और खुफिया ठिकानों में रहकर लगातार ड्रोन और मिसाइलें बना रही है। अमेरिका और इजरायल की भारी बमबारी भी इन भूमिगत ठिकानों का कुछ नहीं बिगाड़ पाई। इस जंग ने इजरायल के इस भ्रम को भी तोड़ दिया कि उसका आयरन डोम अचूक है। हकीकत यह है कि यह सिस्टम खुद इजरायल के शहरों को मलबे में तब्दील होने से नहीं बचा पाया। यूएई को दिए गए डिफेंस सिस्टम को भी ईरानी मिसाइलों ने आसानी से निशाना बनाया। इजरायल ने फिल्मों और उपन्यासों के जरिए अपनी सेना और खुफिया एजेंसी मोसाद की जो एक जादुई छवि बनाई थी वह इस युद्ध में पूरी तरह ध्वस्त हो गई है।
इस युद्ध के शांत होने के बाद खाड़ी देशों की पूरी राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था बदलने वाली है। सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन जैसे देशों ने अमेरिका और इजरायल की मदद से जो सुरक्षा कवच ओढ़ रखा था वह अब तार-तार हो चुका है। सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ रही है कि इजरायल ने इन खाड़ी देशों को ईरान पर हमले के लिए उकसाने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन इन देशों ने ऐन वक्त पर हाथ पीछे खींच लिए। ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद से खाड़ी देशों का भरोसा अमेरिका और इजरायल से उठने लगा है। इन देशों का मानना है कि जो ताकतें खुद को नहीं बचा पा रही हैं वे दूसरों को सुरक्षा क्या देंगी।
यही कारण है कि अब मुस्लिम जगत में एक नया समीकरण आकार ले रहा है। इस युद्ध ने एक बड़ा काम यह किया कि दुनिया भर के शिया और सुन्नी समुदाय के देश एक सुर में बात करने लगे हैं। यहां तक कि नाटो के महत्वपूर्ण सदस्य देश भी इस मामले में अमेरिका के साथ आंख मूंदकर खड़े होने को तैयार नहीं हैं। फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देश भी ईरान से सीधा पंगा लेने के मूड में नहीं दिखते। ऐसे में पारंपरिक रूप से कमजोर माने जाने वाले खाड़ी देशों जैसे कतर या यूएई की तुलना में ईरान पूरे मुस्लिम जगत के एक मजबूत नेता के रूप में उभर रहा है। वक्त की नजाकत को भांपते हुए तुर्की ने भी अब खुलकर ईरान का पक्ष लेना शुरू कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान को मिलता दिख रहा है। लंबे समय से आतंकवाद के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़े पाकिस्तान को इस जंग से एक नई संजीवनी मिल गई है। पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका को बातचीत की मेज पर लाने में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। इस कूटनीतिक कामयाबी से उसने अपने ऊपर लगे कई दागों को धोने की कोशिश की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की इस नई भूमिका की सराहना उसके विरोधी देश भी दबी जबान में कर रहे हैं। पाकिस्तान ने इस संकट का फायदा उठाकर उन देशों को कूटनीतिक मोर्चे पर पीछे धकेल दिया है जो खुद को मुस्लिम देशों का मसीहा बताते थे। चूंकि अभी ईरान और अमेरिका के बीच अंतिम समझौता होना बाकी है इसलिए आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति के मंच पर और भी कई बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं।

