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जायरा वसीम ने वक्फ बोर्ड के कार्यक्रम पर उठाए सवाल

श्रीनगर।

जम्मू कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस समारोह को लेकर पूर्व बॉलीवुड अभिनेत्री जायरा वसीम की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी है। जायरा वसीम ने 15 अगस्त को जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम का वीडियो देखने के बाद सवाल उठाया कि क्या किसी वक्फ बोर्ड की भूमिका ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों के नृत्य तक पहुंचनी चाहिए।

वक्फ बोर्ड की ओर से श्रीनगर में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें स्कूली बच्चों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में छात्राओं ने पारंपरिक परिधान पहनकर मंच पर नृत्य भी किया। इस दौरान तिरंगा फहराया गया और देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम हुए।

कार्यक्रम का नेतृत्व जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन डॉ. सैयद दरख्शां अंदराबी ने किया। समारोह में बच्चों की प्रस्तुतियां भी हुईं। इसी कार्यक्रम की एक वीडियो क्लिप सामने आने के बाद जायरा वसीम ने 16 अगस्त को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

जायरा वसीम ने क्या सवाल उठाया

जायरा वसीम ने अपनी पोस्ट की शुरुआत यह कहते हुए की कि उन्हें कश्मीर के किसी स्कूल की एक वीडियो क्लिप मिली है। उन्होंने लिखा कि यह स्वतंत्रता दिवस समारोह वक्फ बोर्ड के लिए या उसकी ओर से आयोजित किया गया था।

इसके बाद उन्होंने वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठाया। जायरा ने पूछा कि क्या वक्फ बोर्ड एक धार्मिक संस्था नहीं है, जिसे मुस्लिम समुदाय की सेवा करने की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या ऐसी संस्था से इस्लामी मूल्यों को बनाए रखने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।

जायरा की पोस्ट में बच्चों की भागीदारी को लेकर भी सवाल था। उन्होंने पूछा कि जब बच्चों को किसी कार्यक्रम में शामिल किया जाता है तो उनकी भागीदारी का मतलब डांस ही क्यों मान लिया जाता है।

उनके सवाल का एक हिस्सा इस बात पर केंद्रित था कि ऐसे कार्यक्रम किस तरह के मूल्यों को दर्शाते हैं। उन्होंने सीधे तौर पर कार्यक्रम में शामिल बच्चों या उनके परिवारों पर कोई टिप्पणी नहीं की। उनका सवाल मुख्य रूप से वक्फ बोर्ड की भूमिका और उसके आयोजनों को लेकर था।

15 अगस्त पर वक्फ बोर्ड का कार्यक्रम

भारत में हर वर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। जम्मू कश्मीर में भी इस अवसर पर सरकारी और सामाजिक संस्थाओं की ओर से विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इस बार जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से आयोजित कार्यक्रम में स्कूली बच्चों ने हिस्सा लिया। समारोह में तिरंगा फहराया गया। देशभक्ति से जुड़े भाषण हुए। बच्चों ने मंच पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।

कार्यक्रम में छात्राओं की भी भागीदारी रही। सोशल मीडिया पर सामने आई वीडियो क्लिप में कुछ छात्राएं पारंपरिक पोशाक में मंच पर नृत्य करती दिखाई दीं।

इसी वीडियो को देखने के बाद जायरा वसीम ने सवाल उठाया। उनके सवाल ने कश्मीर में धार्मिक संस्थाओं, सार्वजनिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच संबंध को लेकर चर्चा शुरू कर दी।

जायरा के सवाल पर सोशल मीडिया में बहस

जायरा वसीम की पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने उनके सवाल का समर्थन किया। उनका कहना था कि धार्मिक संस्थाओं को अपने कार्यक्रमों में धार्मिक मूल्यों का ध्यान रखना चाहिए।

दूसरी ओर कुछ लोगों ने जायरा की आलोचना की। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस देश का राष्ट्रीय पर्व है और किसी भी धार्मिक या सामाजिक संस्था की ओर से इसे मनाने में कोई असामान्यता नहीं है।

सोशल मीडिया यूजर राहुल रोशन ने जायरा की पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए उनके सवाल को मुस्लिम अलगाववादी मानसिकता से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने सवाल किया कि जब कई हिंदू मंदिर स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं तो वक्फ बोर्ड के स्वतंत्रता दिवस मनाने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए।

हालांकि, यह राहुल रोशन की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया थी। इसे किसी आधिकारिक संस्था का बयान नहीं माना जा सकता।

जायरा के समर्थन और विरोध में प्रतिक्रियाएं

सोशल मीडिया पर जायरा की पोस्ट को लेकर समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिले।

कुछ लोगों ने कहा कि जायरा ने धार्मिक संस्था की जिम्मेदारियों को लेकर एक वैध सवाल उठाया है। उनके अनुसार वक्फ बोर्ड की मूल भूमिका धार्मिक और सामुदायिक संपत्तियों तथा उनसे जुड़े मामलों की देखरेख से संबंधित है। इसलिए ऐसे संस्थानों के सार्वजनिक कार्यक्रमों में धार्मिक मूल्यों को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक है।

दूसरे पक्ष का कहना था कि वक्फ बोर्ड भारतीय कानून के तहत काम करने वाली संस्था है। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर पर कार्यक्रम आयोजित करना अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता।

एक सोशल मीडिया यूजर इमाद मखदूमी ने जायरा की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें भारत में बॉलीवुड में काम करने, मुख्यधारा की फिल्मों का हिस्सा बनने और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की स्वतंत्रता मिली। उन्होंने सवाल किया कि जब कश्मीरी बच्चे अपनी पसंद से ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं तो उस स्वतंत्रता को क्यों नहीं स्वीकार किया जाना चाहिए।

इस तरह बहस धीरे धीरे वक्फ बोर्ड के कार्यक्रम से निकलकर धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत पसंद और सार्वजनिक जीवन में धर्म की भूमिका तक पहुंच गई।

जायरा वसीम का बॉलीवुड छोड़ना भी चर्चा में

जायरा वसीम का नाम इससे पहले भी धर्म और मनोरंजन की दुनिया के बीच अपने फैसलों को लेकर चर्चा में रहा है।

जायरा ने 2019 में बॉलीवुड छोड़ने का ऐलान किया था। उन्होंने अपने फैसले को धर्म से जोड़ते हुए कहा था कि फिल्मी दुनिया में काम करना उनके धार्मिक विश्वासों के अनुरूप नहीं था।

उनका यह फैसला उस समय काफी चर्चा में रहा था। उन्होंने आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ से बॉलीवुड में पहचान बनाई थी। इसके बाद वह ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ और ‘द स्काई इज पिंक’ जैसी फिल्मों में नजर आईं।

फिल्मी करियर छोड़ने के बाद जायरा सार्वजनिक जीवन में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं। हालांकि, समय समय पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा में आते रहे हैं।

इस बार भी उनकी पोस्ट ने कश्मीर और देश के दूसरे हिस्सों में लोगों का ध्यान खींचा है।

असल सवाल वक्फ बोर्ड की भूमिका का

जायरा वसीम की टिप्पणी को केवल बच्चों के नृत्य तक सीमित करके देखना पूरी तस्वीर नहीं देता। उनकी पोस्ट में मुख्य सवाल वक्फ बोर्ड की प्रकृति और जिम्मेदारी को लेकर था।

वक्फ संस्थाएं ऐतिहासिक रूप से धार्मिक और सामुदायिक हितों से जुड़ी रही हैं। भारत में वक्फ बोर्डों की भूमिका कानून के तहत तय होती है। जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड भी इसी व्यापक कानूनी ढांचे के तहत काम करता है।

इसलिए सवाल यह भी है कि किसी वक्फ बोर्ड की ओर से राष्ट्रीय दिवस मनाना उसकी कानूनी और सामाजिक भूमिका के भीतर आता है या नहीं। दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जा सकता है कि किसी धार्मिक समुदाय से जुड़ी संस्था होने का अर्थ यह नहीं है कि वह राष्ट्रीय अवसरों से खुद को अलग रखे।

यही वह बिंदु है जहां इस पूरे विवाद के अलग अलग पक्ष सामने आते हैं।

बच्चों के नृत्य पर भी बहस

इस विवाद का दूसरा पहलू बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुति है।

स्कूलों में स्वतंत्रता दिवस के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम आम बात हैं। देश के अलग अलग हिस्सों में बच्चे गीत, नृत्य, नाटक और दूसरी प्रस्तुतियां देते हैं।

कश्मीर में भी स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर स्कूलों में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं। इसलिए केवल बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुति को देखकर पूरे आयोजन के उद्देश्य पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

लेकिन जायरा वसीम का सवाल इस बात पर है कि धार्मिक संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बच्चों की प्रस्तुति किस तरह की होनी चाहिए। यही सवाल सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस का आधार बना।

कश्मीर में धर्म और सार्वजनिक जीवन पर पुरानी बहस

जम्मू कश्मीर में धर्म का सार्वजनिक जीवन से संबंध लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। यहां धार्मिक संस्थाओं की सामाजिक भूमिका भी मजबूत है। मस्जिदों, दरगाहों और धार्मिक संगठनों का स्थानीय समाज में महत्वपूर्ण स्थान है।

दूसरी ओर कश्मीर भारत का हिस्सा है और यहां राष्ट्रीय पर्व भी व्यापक रूप से मनाए जाते हैं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर सरकारी संस्थाओं के साथ स्कूल, कॉलेज और सामाजिक संगठन भी कार्यक्रम करते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में वक्फ बोर्ड का स्वतंत्रता दिवस समारोह एक अलग तरह की बहस लेकर आया है।

निष्कर्ष

जायरा वसीम की सोशल मीडिया पोस्ट ने जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ सवाल धार्मिक संस्था की भूमिका और इस्लामी मूल्यों को लेकर है। दूसरी तरफ इसे भारत के राष्ट्रीय पर्व में धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी के रूप में देखा जा रहा है।

कार्यक्रम में स्कूली बच्चों की भागीदारी और छात्राओं के नृत्य ने इस बहस को और व्यापक बना दिया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने जायरा के सवाल का समर्थन किया है, जबकि दूसरे लोगों ने इसे उनकी व्यक्तिगत धार्मिक सोच और भारत में सार्वजनिक जीवन की वास्तविकता के बीच टकराव के रूप में देखा।

फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र यही सवाल है कि क्या किसी वक्फ बोर्ड जैसे धार्मिक और सामुदायिक निकाय को स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय समारोह आयोजित करने चाहिए और यदि हां, तो ऐसे कार्यक्रमों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की सीमा क्या होनी चाहिए।

यह बहस केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह कश्मीर में धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और सार्वजनिक जीवन के बीच बदलते रिश्तों की ओर भी इशारा करती है।

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