News

कमाल मौला मस्जिद पर घमासान

नई दिल्ली:

भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर देश में धार्मिक और कानूनी बहस को तेज कर दिया है। अदालत ने हालिया आदेश में भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद परिसर को सरस्वती मंदिर माना है। इस फैसले के खिलाफ अब कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने जा रही है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। बोर्ड का कहना है कि यह फैसला ऐतिहासिक तथ्यों, सरकारी रिकॉर्ड और पुरातात्विक साक्ष्यों के विपरीत है। साथ ही यह पूजा स्थलों की मौजूदा स्थिति बनाए रखने वाले कानून की भावना के भी खिलाफ है।

बोर्ड ने साफ कर दिया है कि कमाल मौला मस्जिद कमेटी इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। इस लड़ाई में बोर्ड हर स्तर पर कानूनी और नैतिक सहयोग देगा।

ALSO READ

बाबरी फैसले पर जमीयत की रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया, न्याय नहीं?

जमीयत बैठक में बढ़ती सांप्रदायिकता और मुस्लिम मुद्दों पर गंभीर चिंता

भोजशाला पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष

फैजान मुस्तफा के बदले सुर, मस्जिदों के विवादों पर दी बाहर समझौते की सलाह

बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद क़ासिम रसूल इलियास ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा कि हाई कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज किया है। उनके मुताबिक, सदियों पुराने राजस्व रिकॉर्ड, औपनिवेशिक दौर के सरकारी दस्तावेज, गजेटियर और मुस्लिम समुदाय के धार्मिक संबंधों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

उन्होंने कहा कि अदालत का फैसला एक ऐसे ऐतिहासिक निष्कर्ष पर आधारित दिखता है, जिसमें मस्जिद की लंबे समय से चली आ रही धार्मिक पहचान को कमतर आंका गया है। जबकि सरकारी दस्तावेजों में इस इमारत को लगातार मस्जिद के रूप में दर्ज किया जाता रहा है।

डॉ. इलियास ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के पुराने रुख का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एएसआई ने वर्षों तक इस स्थल की साझा धार्मिक प्रकृति को स्वीकार किया था। आधिकारिक रिकॉर्ड और साइनबोर्ड में इस जगह को “भोजशाला / कमाल मौला मस्जिद” के रूप में दर्ज किया जाता रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार भी इस स्थल को विवादित और साझा धार्मिक महत्व वाला स्थान मानती रही है।

उन्होंने वर्ष 2003 की उस प्रशासनिक व्यवस्था का भी उल्लेख किया, जिसके तहत हिंदू समुदाय को मंगलवार के दिन पूजा की अनुमति दी गई थी। वहीं मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन नमाज पढ़ने की इजाजत थी। बोर्ड का कहना है कि यह व्यवस्था खुद इस बात का प्रमाण थी कि दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों को मान्यता दी गई थी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का आरोप है कि हाई कोर्ट ने इस साझा व्यवस्था को खत्म करते हुए एएसआई के पहले के दृष्टिकोण से अलग रास्ता अपनाया है।

डॉ. इलियास के मुताबिक, अदालत में मुस्लिम पक्ष ने यह दलील भी दी थी कि राजस्व अभिलेखों में लगातार इस इमारत को मस्जिद बताया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि ठीक इसी स्थान पर राजा भोज के समय का सरस्वती मंदिर मौजूद था।

उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक और सरकारी दस्तावेजों को पर्याप्त महत्व न देना चिंता का विषय है। किसी स्थल की पहचान तय करने में सिर्फ सांस्कृतिक परंपराओं या लोक कथाओं को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

बोर्ड ने एएसआई के हालिया सर्वेक्षण पर भी सवाल उठाए हैं। डॉ. इलियास ने कहा कि सर्वेक्षण में कुछ स्तंभों, नक्काशियों और स्थापत्य अवशेषों को मंदिर से जुड़ा बताया गया है। लेकिन यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मध्यकालीन दौर में कई इमारतों में पुराने निर्माण सामग्री का दोबारा इस्तेमाल किया जाता था।

उनके मुताबिक, किसी मस्जिद परिसर में गैर इस्लामी स्थापत्य तत्वों की मौजूदगी अपने आप यह साबित नहीं करती कि उस स्थल की वर्तमान धार्मिक पहचान समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि सदियों पुरानी इबादत और धार्मिक उपयोग को नजरअंदाज कर केवल स्थापत्य अवशेषों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कहा जा सकता।

डॉ. इलियास ने अदालत के फैसले में राजा भोज से जुड़ी परंपराओं और संस्कृत शिक्षा की विरासत को ज्यादा महत्व दिए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि साहित्यिक उल्लेख और पारंपरिक मान्यताएं हमेशा निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होतीं।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप में कई धार्मिक स्थलों का इतिहास जटिल रहा है। अलग अलग कालखंडों में धार्मिक और स्थापत्य परिवर्तन हुए हैं। ऐसे में किसी एक ऐतिहासिक परत को अंतिम सच मान लेना विवाद को और बढ़ा सकता है।

बोर्ड का कहना है कि फैसले में एक अनुमानित प्राचीन मंदिर और सांस्कृतिक आख्यान को प्राथमिकता दी गई, जबकि मस्जिद की लंबे समय से चली आ रही स्थिति, सरकारी दस्तावेज, साझा प्रशासनिक व्यवस्था और स्वतंत्रता के बाद धार्मिक पहचान बनाए रखने के संवैधानिक सिद्धांतों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

पूजा स्थलों की स्थिति को लेकर बने कानून का हवाला देते हुए बोर्ड ने कहा कि देश का संविधान धार्मिक स्थलों की मौजूदा पहचान की रक्षा का संदेश देता है। ऐसे मामलों में संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

अब इस पूरे मामले की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिक गई हैं। कमाल मौला मस्जिद कमेटी जल्द ही याचिका दायर कर सकती है। माना जा रहा है कि यह मामला सिर्फ एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे जुड़े कानूनी और संवैधानिक सवालों पर भी व्यापक बहस हो सकती है।

फिलहाल, हाई कोर्ट के फैसले के बाद देश की राजनीति और धार्मिक संगठनों में प्रतिक्रिया का दौर जारी है। आने वाले दिनों में यह विवाद और गर्मा सकता है। सबसे अहम सवाल यही है कि क्या सुप्रीम Court इस फैसले पर नई कानूनी व्याख्या पेश करेगा या हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखेगा।