दुबई में क्रिकेट खेलते समय भारतीय प्रवासी की मौत से शोक की लहर
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, दुबई
संयुक्त अरब अमीरात के दुबई शहर से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। वहां रहने वाले एक 38 वर्षीय भारतीय प्रवासी सफवान शानू का रविवार को क्रिकेट खेलते समय दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन हो गया। सफवान मूल रूप से भारत के कर्नाटक राज्य के तटीय कस्बे भटकल के रहने वाले थे। वह पिछले 15 साल से अधिक समय से दुबई में रहकर काम कर रहे थे। इस दर्दनाक घटना के बाद से दुबई और उनके गृहनगर भटकल में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोग गहरे सदमे में हैं। सफवान अपने पीछे पत्नी और चार बच्चों को छोड़ गए हैं, जिनमें से एक बेटी महज चार महीने की है।
इस दुखद हादसे ने न केवल उनके परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया है बल्कि प्रवासी भारतीय समाज को भी हिलाकर रख दिया है। सफवान को जानने वाले लोग लगातार उनके परिवार से संपर्क कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं। उनके करीबी दोस्त और समुदाय के सदस्य इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं कि जो इंसान कुछ समय पहले तक मैदान पर पूरी ऊर्जा के साथ खेल रहा था, वह अब उनके बीच नहीं रहा।
मैदान और आम जिंदगी में सबको जोड़ने वाले इंसान थे सफवान
सफवान शानू के सबसे करीबी दोस्तों में से एक नबील करिकल ने सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक संदेश साझा किया है। नबील ने लिखा कि उन्होंने सिर्फ एक दोस्त नहीं खोया बल्कि एक ऐसा भाई खो दिया जो उनके दिल के बहुत करीब था। उन्होंने बताया कि रविवार से ही उनका फोन लगातार बज रहा है। यूएई और भारत से लोग लगातार फोन करके पूछ रहे हैं कि यह सब कैसे हो गया। नबील के अनुसार सफवान एक ऐसे व्यक्ति थे जो हर किसी की परवाह करते थे।
सफवान कितने भी व्यस्त क्यों न हों, वह हर दो-तीन दिन में अपने दोस्तों को फोन करके उनका हालचाल जरूर लेते थे। उनके फोन करने का कोई विशेष कारण नहीं होता था, वह बस यह जानना चाहते थे कि उनके करीबी लोग ठीक हैं या नहीं। जब भी कोई दोस्त या परिचित किसी मुश्किल दौर से गुजर रहा होता था, सफवान हमेशा उसकी मदद के लिए तैयार रहते थे। उनकी यही संवेदनशीलता और निस्वार्थ स्वभाव लोगों के दिलों को छू जाता था।
प्रवासी समाज के लिए पहचान था सफवान का क्रिकेट
भटकल से आकर दुबई में बसे प्रवासी भारतीयों के लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल या मनोरंजन का साधन नहीं है। यह खेल वहां उनकी क्षेत्रीय पहचान और आपसी भाईचारे का एक बहुत बड़ा जरिया है। सफवान इस भावना को पूरी तरह से जीते थे। वह यूएई में भटकल प्रवासियों के बीच पिछले 13 वर्षों से क्रिकेट का आयोजन करने वाले प्रमुख संगठन ‘नवाएथ क्रिकेटर्स दुबई’ (NCD) के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे।
वह हमेशा अपने साथियों और आयोजकों को इस बात के लिए प्रेरित करते थे कि वे खेल के इस मंच को हमेशा सक्रिय और एकजुट रखें। उनका मानना था कि खेल के जरिए लोगों को एक साथ लाना और भाईचारे को मजबूत करना बहुत जरूरी है। भटकल समाज के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि सफवान अपने कस्बे के सबसे बेहतरीन बल्लेबाजों में गिने जाते थे। स्थानीय स्तर पर होने वाले टूर्नामेंटों में उनकी मांग हमेशा बहुत ज्यादा रहती थी। वह एक सामान्य रविवार के मैच में भी उतनी ही गंभीरता और ऊर्जा के साथ खेलते थे, जितनी ऊर्जा वह किसी बड़े और प्रतिस्पर्धी मैच में दिखाते थे।
अंतिम विदाई देने उमड़ा पूरा शहर, अल कुसैस कब्रिस्तान में हुआ दफ़न
सफवान शानू के आकस्मिक निधन के बाद सोमवार को दुबई के अल कुसैस कब्रिस्तान में उनके अंतिम संस्कार का आयोजन किया गया। इस दौरान वहां का नजारा बेहद गमगीन था। सफवान को अंतिम विदाई देने के लिए सैकड़ों की संख्या में प्रवासी भारतीय और स्थानीय लोग कब्रिस्तान पहुंचे। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए उनके बुजुर्ग माता-पिता भी तुरंत भारत से दुबई पहुंचे।
दुबई में रहने वाले उनके बड़े भाई मोहम्मद फैरोज शानू ने रोते हुए बताया कि सफवान को हर कोई बहुत प्यार करता था। पूरा समाज उनकी इज्जत करता था। फैरोज ने कहा कि उनका परिवार अभी तक इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि सफवान अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने मुश्किल घड़ी में साथ खड़े रहने के लिए पूरे भटकल समुदाय का शुक्रिया अदा किया।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़, पहले भी खो चुके हैं एक बेटा
सफवान के माता-पिता के लिए यह गम किसी पहाड़ टूटने जैसा है। सफवान के रूप में उन्होंने अपने दूसरे जवान बेटे को खोया है। इससे पहले ठीक 14 साल पहले उनके सबसे छोटे बेटे गजवान शानू का भी महज 16 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन हो गया था। एक ही परिवार के दो बेटों का इतनी कम उम्र में इस तरह चले जाना किसी भी माता-पिता के लिए असहनीय है।
दुबई में रहने वाले भारतीय प्रवासियों ने इस संकट की घड़ी में सफवान की पत्नी, चारों बच्चों और उनके माता-पिता को हर संभव सहायता देने का बीड़ा उठाया है। समुदाय के लोग लगातार परिवार के साथ बने हुए हैं ताकि उन्हें इस गहरे मानसिक आघात से उबरने में थोड़ी मदद मिल सके। सफवान की यादें और उनके द्वारा समाज के लिए किए गए कार्य हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।

