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1857 से आजादी तक मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवगाथा

नौशाद अख्तर

भारत की आजादी की कहानी केवल कुछ बड़े नेताओं, आंदोलनों और ऐतिहासिक घटनाओं की कहानी नहीं है। इसके पीछे उन हजारों लोगों का संघर्ष भी है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अलग-अलग मोर्चों पर आवाज उठाई। किसी ने हथियार उठाए, किसी ने अखबार को अपना हथियार बनाया, किसी ने जेल की यातनाएं सहीं और किसी ने शिक्षा तथा सामाजिक सुधार के जरिए देश में बदलाव की नींव रखी।

मुस्लिम समाज से आने वाले ऐसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी भी इस संघर्ष का अहम हिस्सा रहे। 1857 के विद्रोह से लेकर असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और आजादी की अंतिम लड़ाई तक उनका योगदान अलग-अलग रूपों में सामने आता है।

आजादी के 80वें वर्ष के मौके पर इस इतिहास को याद करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि भारत की स्वतंत्रता किसी एक समुदाय की उपलब्धि नहीं थी। यह उन तमाम भारतीयों के सामूहिक संघर्ष का परिणाम थी, जिन्होंने विदेशी शासन से मुक्ति के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी।


भाग-1 : 1857 से राष्ट्रीय आंदोलन तक

1857 में अंग्रेजों के खिलाफ उठी बड़ी आवाज

भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष लंबे समय से पनप रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीतियों, आर्थिक शोषण और राजनीतिक हस्तक्षेप ने समाज के अलग-अलग वर्गों में नाराजगी पैदा कर दी थी। 1857 में यही असंतोष एक बड़े विद्रोह में बदल गया।

दिल्ली में मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोह का प्रतीक बनाया गया। उनके साथ बख्त खान, पीर अली खान और मौलवी अहमदुल्लाह शाह जैसे कई मुस्लिम नेताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला।

बख्त खान ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में सूबेदार रह चुके थे। विद्रोह के दौरान वह दिल्ली पहुंचे और बागी सैनिकों की कमान संभाली। उन्होंने बहादुर शाह जफर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को संगठित करने का प्रयास किया।

पटना के पीर अली खान भी 1857 की क्रांति के महत्वपूर्ण नामों में शामिल थे। पेशे से किताबों का कारोबार करने वाले पीर अली ने ब्रिटिश विरोधी साहित्य और क्रांतिकारी गतिविधियों के जरिए आंदोलन को मजबूत किया। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर 7 जुलाई 1857 को फांसी दे दी।

अवध में मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। वह धार्मिक नेता होने के साथ-साथ प्रभावशाली राजनीतिक और सैन्य व्यक्तित्व भी थे। उन्होंने लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ लामबंद किया।

बेगम हजरत महल ने संभाली लखनऊ की कमान

1857 के विद्रोह में महिलाओं की भूमिका का जिक्र आते ही रानी लक्ष्मीबाई का नाम लिया जाता है, लेकिन इसी दौर में अवध की बेगम हजरत महल ने भी अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।

अंग्रेजों ने अवध पर कब्जा किया और नवाब वाजिद अली शाह को निर्वासित कर दिया। इसके बाद बेगम हजरत महल ने लखनऊ में प्रतिरोध की कमान संभाली। उन्होंने विद्रोही ताकतों को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा।

बाद में उन्हें नेपाल जाना पड़ा, लेकिन उनका संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का हिस्सा बन गया। बेगम हजरत महल का नाम इस बात की याद दिलाता है कि 1857 की लड़ाई में महिलाओं ने भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाई थी।

कांग्रेस के शुरुआती दौर में मुस्लिम नेतृत्व

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद मुस्लिम समाज के कई नेताओं ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

बदरुद्दीन तैयबजी इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। वह प्रसिद्ध वकील, समाज सुधारक और राष्ट्रीय नेता थे। 1887 में उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। वह कांग्रेस के शुरुआती मुस्लिम अध्यक्षों में प्रमुख थे।

तैयबजी का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक सुधार और शिक्षा भी जरूरी हैं। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया और महिलाओं की शिक्षा को भी प्रोत्साहित किया।

इस दौर में स्वतंत्रता आंदोलन धीरे-धीरे एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले रहा था। इसमें अलग-अलग धर्मों, क्षेत्रों और सामाजिक वर्गों के लोग शामिल होने लगे थे।

सैफुद्दीन किचलू और जलियांवाला बाग

पंजाब के स्वतंत्रता आंदोलन में डॉ. सैफुद्दीन किचलू का नाम विशेष महत्व रखता है। वह वकील और शिक्षाविद थे तथा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ मुखर रहे।

रॉलेट एक्ट के विरोध में उन्होंने आंदोलन किया। उनकी और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के बाद अमृतसर में व्यापक विरोध हुआ।

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में हजारों लोग जमा हुए थे। जनरल डायर के आदेश पर ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थी भीड़ पर गोलियां चला दीं। इस नरसंहार ने पूरे देश को हिला दिया और आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी।

किचलू का राजनीतिक जीवन हिंदू-मुस्लिम एकता की मजबूत मिसाल रहा। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष जारी रखा और लंबे समय तक जेल में भी रहे।

बी अम्मा ने महिलाओं को आंदोलन से जोड़ा

अबादी बानो बेगम, जिन्हें बी अम्मा के नाम से जाना जाता है, स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी का महत्वपूर्ण चेहरा थीं। वह मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली की मां थीं, लेकिन उनकी पहचान केवल उनके बेटों तक सीमित नहीं थी।

उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होकर महिलाओं को अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। खिलाफत आंदोलन के दौर में उनका प्रभाव विशेष रूप से दिखाई दिया।

उस समय महिलाओं का सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में आना आसान नहीं था। ऐसे माहौल में बी अम्मा का आगे आना अपने आप में एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव था।

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