खालिक को खालिक से कैसे मांगा जाए ?
अबू शहमा अंसारी

आज का इंसान पहले से ज्यादा व्यस्त है। उसके पास साधन हैं। तकनीक है। सुविधा है। दुनिया उसकी मुट्ठी में दिखाई देती है। मगर एक सवाल अब भी अधूरा है। क्या इंसान सचमुच सुकून में है। शायद नहीं।
बाहर की दुनिया जितनी चमकदार हुई है, भीतर का इंसान उतना ही अकेला दिखाई देता है। शहरों में रोशनी बढ़ी है। हाथों में महंगे फोन हैं। रिश्तों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर मुस्कुराती दिखती हैं। लेकिन दिलों के भीतर बेचैनी का एक अंधेरा भी साथ साथ बढ़ा है। लोग हंसते हैं, मगर संतुष्ट नहीं दिखते। लोग साथ हैं, मगर भरोसा कम होता जा रहा है।
ऐसे दौर में एक सवाल बार बार इंसान की रूह को छूता है। क्या हमने कभी अपने रब से सिर्फ रब को मांगा है।
हमारी दुआओं का तरीका बदल गया है। हम नौकरी मांगते हैं। कारोबार मांगते हैं। दौलत, शोहरत, सफलता और रिश्तों की आसानी मांगते हैं। मगर कितने लोग ऐसे हैं जो तन्हाई में हाथ उठाकर यह कहते हों कि ऐ मेरे परवरदिगार, मुझे सबसे पहले तू चाहिए।
यहीं से इंसान की रूहानी जिंदगी की असली शुरुआत होती है। जब इबादत जरूरत से निकलकर मोहब्बत में बदलती है।
असल परेशानी यह नहीं कि इंसान के पास दुनिया कम है। परेशानी यह है कि उसके दिल में खुदा की जगह छोटी होती जा रही है। कामयाबी को पैसे से मापा जाने लगा है। इज्जत का पैमाना शोहरत बन गया है। जिंदगी की दौड़ इतनी तेज हो चुकी है कि इंसान खुद से मिलने का वक्त भी खोता जा रहा है।
आज का नौजवान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वह हर वक्त लोगों के बीच दिखाई देता है। मोबाइल स्क्रीन पर मौजूद रहता है। उसके पास बातचीत के कई जरिये हैं। लेकिन सुकून कम है। भीतर एक खालीपन है जिसे वह समझ नहीं पा रहा। शायद इसलिए कि उसने दुनिया की आवाजें तो बहुत सुन लीं, मगर अपने दिल की खामोशी को सुनने की कोशिश कम की।
यह सच है कि इंसान के दिल का खालीपन दुनिया की किसी चीज से नहीं भरता। न पैसा उसे पूरी तरह भर पाता है। न रिश्ते। न प्रसिद्धि। उसका असली सुकून उस रिश्ते में है जो उसे अपने पैदा करने वाले से जोड़ता है।
अफसोस यह है कि हमने इबादत को भी कई बार सिर्फ एक आदत बना दिया है। नमाज पढ़ी जाती है, मगर दिल कहीं और होता है। दुआ की जाती है, मगर भरोसा अधूरा रहता है। जुबान पर खुदा का नाम होता है, मगर जिंदगी में उसका असर कम दिखता है।
मोहब्बत का एक आसान सा उसूल है। जब इंसान किसी से सच्ची मोहब्बत करता है तो वह सिर्फ उसकी दी हुई चीजें नहीं चाहता। वह उसकी नजदीकी चाहता है। अगर बंदा सचमुच अपने रब से मोहब्बत करे तो वह सिर्फ नेमतें नहीं, नेमत देने वाले को चाहता है।
खुदा को मांगने का मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं है। इसका मतलब यह भी नहीं कि इंसान तरक्की न करे। इस्लाम दुनिया से भागने की नहीं, दुनिया में रहते हुए अपने रब से जुड़े रहने की सीख देता है। इंसान कारोबार करे। सपने देखे। मेहनत करे। लेकिन दिल का सहारा सिर्फ दुनिया को न बनाए।
क्योंकि जब इंसान का रिश्ता अपने रब से मजबूत होता है तो हालात उसे आसानी से नहीं तोड़ पाते। मुश्किलें आती हैं। दर्द भी आता है। मगर उम्मीद बची रहती है। उसे यकीन होता है कि कोई है जो हर हाल में उसके साथ है।
इतिहास भी यही बताता है। बड़ी शख्सियतों की ताकत सिर्फ बाहरी साधन नहीं थी। उनका भरोसा अपने रब पर था। यही भरोसा उन्हें मुश्किल हालात में मजबूत बनाता रहा। यही यकीन उन्हें टूटने से बचाता रहा।
आज जरूरत इस बात की है कि इंसान फिर अपने भीतर लौटे। अपने दिल को जलन, दिखावे और नफरत से साफ करे। इबादत में सच्चाई लाए। खुदा से रिश्ता सिर्फ मजबूरी का नहीं बल्कि मोहब्बत का बनाए।
क्योंकि यह दुनिया हमेशा रहने वाली नहीं है। यहां दौलत बदलती है। लोग बदलते हैं। हालात बदलते हैं। मगर एक रिश्ता ऐसा है जो कभी नहीं बदलता। वह रिश्ता इंसान और उसके रब का है।
शायद सच्चा सुकून वहीं छिपा है। जब इंसान दुनिया की तमाम थकानों, परेशानियों और अधूरी ख्वाहिशों के बीच एक दिन सिर झुकाकर यह कह सके कि ऐ मेरे मालिक, मुझे सबसे पहले सिर्फ तू चाहिए।
लेखक परिचय:
यह विचारात्मक लेख अबूशहमा अंसारी के मूल लेख पर आधारित है। लेखक ऑल इंडिया माइनॉरिटीज फोरम फॉर डेमोक्रेसी के जनसंपर्क एवं प्रकाशन विभाग से जुड़े हैं।

