NewsTOP STORIES

नशे के खिलाफ MANUU की पहल

श्रीनगर:

नशा सिर्फ एक बुरी आदत नहीं है। यह धीरे धीरे इंसान, परिवार और समाज को भीतर से तोड़ देता है। खासकर युवाओं के बीच बढ़ती नशे की लत आज एक गंभीर सामाजिक चिंता बन चुकी है। ऐसे समय में जागरूकता ही सबसे मजबूत हथियार मानी जाती है। इसी सोच के साथ मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज फॉर वुमेन में नशा मुक्ति को लेकर एक खास जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।

14 मई 2026 को आयोजित यह कार्यक्रम “नशा मुक्त भारत अभियान” के तहत हुआ। इसका मकसद छात्राओं और शिक्षकों के बीच नशे के खतरों को लेकर जागरूकता पैदा करना था। साथ ही यह समझाना भी कि नशे की समस्या सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज की प्राचार्य डॉ. रैहाना मलिक ने की। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने युवाओं के बीच बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज जरूरत सिर्फ नशे की बुराइयों पर चर्चा करने की नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को इसके खिलाफ खड़ा होने की है।

डॉ. रैहाना मलिक ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं होती। छात्रों को सामाजिक और नैतिक रूप से मजबूत बनाना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने छात्राओं से अपील की कि वे खुद जागरूक बनें और अपने आसपास के लोगों को भी नशे के नुकसान के बारे में बताएं।

कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राजा मुजफ्फर भट्ट ने मुख्य वक्ता के रूप में हिस्सा लिया। उन्होंने नशे की लत के कारणों, उससे जुड़े भ्रम और उसके सामाजिक प्रभावों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि कई बार युवा तनाव, अकेलेपन, गलत संगत या जिज्ञासा के कारण नशे की ओर बढ़ जाते हैं। लेकिन धीरे धीरे यह आदत उनकी जिंदगी पर हावी हो जाती है।

डॉ. भट्ट ने कहा कि नशा किसी एक परिवार की समस्या नहीं है। यह समाज के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। उन्होंने छात्रों को आगाह किया कि सोशल मीडिया, फिल्मों या दोस्तों के प्रभाव में आकर किसी भी तरह के नशे को सामान्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

कार्यक्रम में एक अलग और संवेदनशील पहलू भी सामने आया। प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान आगा सैयद हादी मोहम्मद मूसवी ने कुरआन और सुन्नत की रोशनी में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर बात की। उन्होंने कहा कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका संयम और सही रास्ते पर टिके रहना है।

उन्होंने युवाओं से कहा कि धर्म इंसान को आत्मसंयम, जिम्मेदारी और बेहतर जीवन का संदेश देता है। अगर युवा अपने नैतिक मूल्यों से जुड़े रहें, तो वे गलत रास्तों से खुद को बचा सकते हैं।

कार्यक्रम के दौरान “कोशिश” नामक गैर सरकारी संगठन के अध्यक्ष डॉ. रऊफ मोहिउद्दीन मलिक की नशा जागरूकता पर आधारित प्रस्तुति भी दिखाई गई। इस प्रस्तुति में नशे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक नुकसान को आसान और प्रभावी तरीके से समझाया गया। छात्रों ने इसे गंभीरता से देखा और कई महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने की कोशिश की।

कार्यक्रम का संचालन सहायक प्रोफेसर शोकत अहमद ने किया। इसकी शुरुआत शोधार्थी अदफार अहमद द्वारा कुरआन की तिलावत से हुई, जिसने पूरे माहौल को गंभीर और सकारात्मक बना दिया।

इस आयोजन की खास बात इसका संवादात्मक स्वरूप रहा। कार्यक्रम में छात्रों और शिक्षकों के साथ सवाल जवाब का सत्र भी रखा गया। इस दौरान कई छात्राओं ने नशे से जुड़े सवाल पूछे और विशेषज्ञों से राय ली। इससे माहौल सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक खुली चर्चा का रूप ले सका।

कार्यक्रम के अंत में सहायक प्रोफेसर डॉ. एजाज अब्दुल्ला ने धन्यवाद ज्ञापन पेश किया। उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई किसी एक संस्था या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। अगर परिवार, शिक्षक और समाज साथ आएं, तभी नशा मुक्त समाज का सपना सच हो सकता है।

श्रीनगर में आयोजित यह कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिक आयोजन नहीं था। यह एक याद दिलाने वाली पहल थी कि युवा पीढ़ी को बचाने के लिए जागरूकता, संवाद और सामूहिक जिम्मेदारी सबसे जरूरी है। क्योंकि नशे से लड़ाई कानून से शुरू हो सकती है, लेकिन उसका असली हल समाज के भीतर से ही निकलता है।