विशेष संपादकीय: आयतुल्लाह अली खामनेई – एक ‘लौह पुरुष’ का अवसान और एक युग का अंत
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वरिष्ठ संपादक, मुस्लिम नाउ ब्यूरो
इतिहास गवाह है कि शेर केवल जंगलों में नहीं रहते, बल्कि इंसानी शक्लों में भी उभरते हैं। 1 मार्च 2026 की सुबह जब दुनिया की सुर्खियाँ आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर से पटी पड़ी थीं, तब असल में एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस ‘अडिग प्रतिरोध’ के युग का अंत हो रहा था जिसने पिछले साढ़े तीन दशकों से पश्चिमी साम्राज्यवाद की आँखों में आँखें डालकर बात की थी। 86 वर्ष की आयु में अमेरिका और इजरायल के भीषण हवाई हमले में शहीद हुए खामेनेई को दुनिया एक ऐसे योद्धा के रूप में याद रखेगी जिसने सद्दाम हुसैन, यासिर अराफात और कर्नल गद्दाफी की उस विरासत को जिंदा रखा, जहाँ महाशक्तियों के सामने झुकना मौत से बदतर माना जाता था।

महाशक्तियों के सामने ‘अजेय दीवार’
आयतुल्लाह अली खामेनेई आज के दौर के वह आखिरी ‘शेर’ थे जिन्होंने अकेले दम पर दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकतों—अमेरिका और इजरायल—को चुनौती दी। उनके शासनकाल की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे कभी डिगे नहीं। उनके दोस्त कहे जाने वाले मुल्कों ने भले ही पर्दे के पीछे इजरायल के साथ मिलकर उनकी मौत के मंसूबे बांधे हों, लेकिन खामेनेई ने कभी उनसे शिकायत नहीं की। उनका मानना था कि दुश्मन से लड़ना आसान है, लेकिन ‘आस्तीन के सांपों’ के बीच रहकर अपनी विचारधारा को बचाए रखना असली बहादुरी है।
खामेनेई ने ईरान को केवल एक देश नहीं, बल्कि ‘प्रतिरोध की धुरी’ (Axis of Resistance) का केंद्र बना दिया। लेबनान में हिजबुल्लाह से लेकर गाजा में हमास और यमन में हूतियों तक, उन्होंने एक ऐसा नेटवर्क खड़ा किया जिसने इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को हमेशा चरम पर रखा। यही कारण है कि आज उनकी मौत पर जहाँ पश्चिम में जश्न का माहौल हो सकता है, वहीं दुनिया भर के मजलूम तबकों में एक गहरी उदासी है।

बचपन का संघर्ष और क्रांतिकारी वैचारिकी
खामेनेई की इस ‘शेर’ जैसी फितरत के बीज उनके बचपन में ही बो दिए गए थे। मशहद के एक बेहद साधारण परिवार में जन्मे अली खामेनेई ने गरीबी को करीब से देखा था। उनके अपने शब्दों में, “कई बार खाने के लिए केवल किशमिश और सूखी रोटी होती थी।” लेकिन इस अभाव ने उन्हें कमजोर नहीं, बल्कि सख्त बनाया।
13 साल की उम्र में जब उन्होंने क्रांतिकारी मौलवी नवाब सफवी का भाषण सुना, तो उनके भीतर राजशाही और विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ नफरत की चिंगारी सुलगी। 1950 और 60 के दशक में शाह के जुल्मों और सावाक (SAWAK) की प्रताड़ना ने उन्हें एक ऐसे नेता में बदल दिया, जिसके लिए जेल की कोठरी (सेल नंबर 14) एक इबादतगाह बन गई। खुमैनी के मार्गदर्शन में उन्होंने जिस ‘इस्लामी गणतंत्र’ का सपना देखा, उसे उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक सींचा।

सत्ता का सफर: खुमैनी के बाद की विरासत
1989 में जब आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी का इंतकाल हुआ, तब दुनिया को लगा था कि ईरान बिखर जाएगा। लेकिन खामेनेई ने न केवल कमान संभाली, बल्कि ईरान को एक ऐसी ताकत बना दिया जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन था। उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में दो कार्यकाल (1981-89) पूरे करने के बाद ‘सुप्रीम लीडर’ का पद संभाला। उनके नेतृत्व में ईरान ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल किया, जिसने अमेरिका की रातों की नींद उड़ा दी।
भले ही 2025 में अमेरिका और इजरायल ने बमबारी कर ईरान के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन खामेनेई की ‘वीर लचीलापन’ (Heroic Flexibility) की नीति ने ईरान को टूटने नहीं दिया। उन्होंने प्रतिबंधों की मार झेली, अपनी अर्थव्यवस्था को जर्जर होते देखा, लेकिन ‘परमाणु गौरव’ से समझौता नहीं किया।

आंतरिक चुनौतियां और दमन का आरोप
एक पत्रकार के तौर पर हमें उनकी शख्सियत के दूसरे पहलू को भी देखना होगा। खामेनेई का शासनकाल केवल बाहरी युद्धों का नहीं, बल्कि आंतरिक संघर्षों का भी रहा। 2009 का ‘ग्रीन मूवमेंट’, 2019 का ‘खूनी नवंबर’ और 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद भड़का ‘महिला, जीवन, स्वतंत्रता’ आंदोलन—ये वो मौके थे जब ईरान की अपनी जनता ने व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई।
आलोचकों का कहना है कि खामेनेई ने अपने पद को बचाने के लिए दमन का सहारा लिया। जनवरी 2026 का नरसंहार, जिसमें 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की खबर है, उनके दामन पर एक ऐसा दाग है जिसे इतिहास कभी नहीं धो पाएगा। लेकिन खामेनेई के समर्थकों के लिए, यह सब उस ‘महान क्रांति’ को बचाने की कीमत थी जिसे पश्चिम ‘मखमली क्रांति’ के जरिए खत्म करना चाहता था।

साहित्यिक अभिरुचि और वैश्विक दृष्टिकोण
खामेनेई केवल एक कट्टरपंथी धार्मिक नेता नहीं थे। वे एक प्रबुद्ध पाठक भी थे। यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि विक्टर ह्यूगो की ‘लेस मिजरेबल्स’ उनकी पसंदीदा किताब थी, जिसे वे ‘ज्ञान की पुस्तक’ कहते थे। उन्होंने टॉल्स्टॉय और स्टीनबेक को पढ़ा था। उनकी यह साहित्यिक समझ ही थी जिसने उन्हें पश्चिम की चालों को समझने की वह गहरी दृष्टि दी, जिसे ‘ग़र्बज़दगी’ (Westoxification) कहा जाता है। वे जानते थे कि पश्चिम का हमला केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक भी है।
अंत या एक नई शुरुआत?
12 जून 2025 से शुरू हुए ’12 दिवसीय युद्ध’ और उसके बाद के घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया था कि इजरायल और अमेरिका अब खामेनेई को जिंदा नहीं छोड़ना चाहते। शनिवार सुबह तेहरान में उनके कार्यालय पर हुआ हमला उसी साजिश का हिस्सा था।
खामेनेई की शहादत के बाद ईरान और पूरे मध्य-पूर्व में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। सद्दाम और गद्दाफी के बाद वे आखिरी ऐसे नेता थे जो बिना डरे अमेरिका को ललकारते थे। अब सवाल यह है कि क्या ईरान उनके ‘दूसरे चरण’ (Second Step) की पहल को आगे बढ़ा पाएगा? क्या उनकी मौत के बाद ईरान में कोई ऐसा नेता उभरेगा जो उनकी तरह ‘शेर’ की सिफत रखता हो?
दुनिया याद रखेगी कि जिस शख्स को ‘आतंक का प्रायोजक’ कहकर बदनाम किया गया, वह असल में अपनी जमीन और अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा था। उन पर आरोप लगाने वाले मुल्क खुद नरसंहारों और अवैध कब्जों के गुनहगार हैं।
निष्कर्ष: आयतुल्लाह अली खामेनेई का जाना एक युग का समापन है। वे एक ऐसी मशाल थे जिसने साम्राज्यवाद के अंधेरे में ईरान को रास्ता दिखाया। उनकी कमियां इतिहासकार लिखेंगे, लेकिन उनकी बहादुरी की दास्तां ईरान की गलियों और ‘प्रतिरोध के धड़े’ के योद्धाओं के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी। एक शेर का अंत जरूर हुआ है, लेकिन उसकी दहाड़ की गूंज सदियों तक मध्य-पूर्व की राजनीति में सुनाई देती रहेगी।

