मक्का में बदला जाएगा काबा का गिलाफ, जानिए किसवा का इतिहास
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सउदी अरब के पवित्र शहर मक्का में एक बेहद खास और पवित्र धार्मिक रस्म निभाई जाने वाली है। यह रस्म पवित्र काबा को ढकने वाले काले रेशमी कपड़े को बदलने की है। इस पवित्र कपड़े को अरबी भाषा में किसवा कहा जाता है। हर साल की तरह इस बार भी मुहर्रम की पहली तारीख को यह सालाना परंपरा पूरी की जाएगी। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक मुहर्रम की पहली तारीख से ही नए हिजरी साल की शुरुआत होती है। दुनिया भर के करोड़ों मुसलमानों के लिए यह पल बेहद आस्था और सम्मान से जुड़ा है। आइए जानते हैं कि किसवा को बदलने की यह सदियों पुरानी परंपरा क्या है और इस बेशकीमती गिलाफ को कैसे तैयार किया जाता है।

क्या है पवित्र काबा और इसका महत्व
काबा अरबी भाषा का शब्द है जिसका सीधा मतलब एक घन या चौकोर ढांचा होता है। यह इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र स्थल है। मक्का शहर की मस्जिद अल हराम यानी ग्रैंड मॉस्क के बिल्कुल बीच में काबा स्थित है। दुनिया भर के मुसलमान अपनी पांच वक्त की नमाज के दौरान इसी पवित्र ढांचे की तरफ मुंह करके खड़े होते हैं। नमाज की इस तय दिशा को किबला कहा जाता है। भौगोलिक रूप से काबा की ऊंचाई लगभग 13.1 मीटर है। इसकी लंबाई 12.8 मीटर और चौड़ाई 11.03 मीटर के करीब है।
काबा का गिलाफ बदलने की रस्म. Source: Asharq Al-Awsat
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार काबा का निर्माण सबसे पहले पैगंबर इब्राहिम और उनके बेटे पैगंबर इस्माइल ने मिलकर किया था। उन्होंने अल्लाह के आदेश पर इस इबादतगाह की बुनियाद रखी थी। इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान में भी इसका जिक्र मिलता है। इस्लाम के आगमन से पहले भी अरब के विभिन्न कबीले यहां पूजा करते थे। सन 630 ईस्वी में जब पैगंबर मोहम्मद मदीना से वापस मक्का लौटे तो उन्होंने काबा को मूर्तियों से मुक्त कर इसे फिर से एकेश्वरवाद की इबादत का केंद्र बनाया था। आज के समय में हर साल हज और उमराह के लिए यहां दो करोड़ से ज्यादा जायरीन पहुंचते हैं।
भीतर से कैसा दिखता है काबा
काबा के उत्तर पूर्वी हिस्से में एक बेहद खूबसूरत सोने का दरवाजा लगा है। यह दरवाजा जमीन की सतह से करीब दो मीटर ऊपर है। इस भव्य दरवाजे को बनाने में लगभग 280 किलोग्राम शुद्ध सोने का इस्तेमाल किया गया है। काबा के आंतरिक हिस्से को साल में केवल दो बार औपचारिक सफाई के लिए खोला जाता है। अंदर का हिस्सा बेहद सादा और शांत है। छत को संभालने के लिए तीन मजबूत लकड़ी के खंभे लगे हैं। फर्श और दीवारों पर संगमरमर लगा हुआ है। छत से प्राचीन लालटेन लटकी रहती हैं। अंदर की दीवारों पर ऐतिहासिक रूप से लाल, हरे और गहरे नीले रंग के खूबसूरत सूती कपड़े के पर्दे लगे होते हैं।
क्या होता है किसवा और इसकी बनावट
किसवा उस काले रेशमी कपड़े को कहते हैं जिससे काबा को चारों तरफ से ढका जाता है। अरबी शब्द किसवा का मूल अर्थ ही किसी चीज को ढकना या लपेटना होता है। इस गिलाफ की कुल ऊंचाई 14 मीटर होती है। इसे कपड़े की 47 अलग-अलग पट्टियों को आपस में जोड़कर तैयार किया जाता है।
सोने के तारों से कढ़ाई का काम. Source: Arab News
इसके ऊपरी दो तिहाई हिस्से पर एक खूबसूरत बेल्ट जैसी पट्टी होती है जिसे हिज़ाम कहा जाता है। इस पट्टी की चौड़ाई 95 सेंटीमीटर और लंबाई करीब 47 मीटर होती है। काबा के दरवाजे के ऊपर लटकने वाले पर्दे को सितारा या बुरका कहा जाता है। यह पूरे किसवा का सबसे ज्यादा नक्काशी और कढ़ाई वाला हिस्सा होता है। इस पर पवित्र कुरान की आयतें लिखी होती हैं। हज के दिनों में जब लाखों की भीड़ तवाफ यानी काबा के चक्कर लगाती है तो नुकसान से बचाने के लिए किसवा के निचले हिस्से को थोड़ा ऊपर उठा दिया जाता है।

किसवा को बनाने की लागत और वजन
आज के समय में एक किसवा को तैयार करने में लगभग 25 मिलियन सऊदी रियाल यानी करीब 66 लाख डॉलर का खर्च आता है। इसे बनाने में 670 किलोग्राम शुद्ध प्राकृतिक रेशम का उपयोग होता है। इसके साथ ही इस पर कढ़ाई करने के लिए 120 किलोग्राम सोने के शुद्ध तारों और लगभग 100 से 120 किलोग्राम चांदी के तारों का इस्तेमाल किया जाता है।
मक्का में स्थित विशेष किसवा फैक्ट्री में 240 से ज्यादा कुशल कारीगर और तकनीकी विशेषज्ञ रात-दिन काम करते हैं। यहाँ आधुनिक मशीनों के साथ-साथ पारंपरिक हथकरघा और अरबी कैलीग्राफी का बेहतरीन तालमेल देखने को मिलता है। गिलाफ बनाने के लिए बेहतरीन रेशम आज के समय में इटली से मंगाया जाता है। सबसे पहले रेशम को ठंडे पानी और जैतून के तेल के साबुन से धोया जाता है ताकि उसका प्राकृतिक मोम साफ हो सके। इसके बाद इसे 90 डिग्री तापमान वाले गर्म पानी में कई बार साफ करके काले रंग में रंगा जाता है।
गिलाफ का ऐतिहासिक सफर
काबा को कपड़े से ढकने की प्रथा इस्लाम के आने से पहले से चली आ रही है। इतिहासकारों का मानना है कि सन 400 ईस्वी में यमन के राजा तुब्बा असद कामिल ने सबसे पहले काबा को यमन के विशेष कपड़े से ढका था। कुछ लोग मानते हैं कि इसकी शुरुआत पैगंबर इस्माइल ने की थी लेकिन इसका कोई पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
| कालखंड और साम्राज्य | गिलाफ का निर्माण स्थल | ऐतिहासिक विशेषता |
|---|---|---|
| शुरुआती दौर (खिलाफत) | मिस्र (इजिप्ट) | दमिश्क और दमिएट्टा के शाही कारखानों में बुनाई होती थी। |
| उमय्यद काल | दमिश्क (सीरिया) | इस काल में गिलाफ के लिए लाल और पीले रंगों का भी इस्तेमाल हुआ। |
| अब्बासी काल | बगदाद (इराक) | इस दौर से मुख्य रूप से काले रंग के किसवा की पहचान पक्की हुई। |
| आधुनिक काल | मक्का (सऊदी अरब) | अब सऊदी राजवंश पूरी तरह मक्का की अपनी फैक्ट्री में इसे तैयार कराता है। |

इतिहास में किसवा हमेशा काले रंग का नहीं था। अलग-अलग दौर में इसके रंग बदलते रहे हैं। कभी यह सफेद, कभी हरा तो कभी पीला और लाल भी हुआ करता था। अब्बासी काल के बाद से काले रंग को ही स्थाई रूप से चुन लिया गया।
पुराने गिलाफ का क्या किया जाता है
जब मुहर्रम की पहली तारीख को पुराना किसवा उतारा जाता है तो उसे वापस उसी सरकारी कारखाने में भेजा जाता है। वहां इसके अलग-अलग हिस्से किए जाते हैं। सोने और चांदी की कढ़ाई वाले सबसे कीमती हिस्सों और कुरान की आयतों वाले टुकड़ों को बहुत सावधानी से काटकर सुरक्षित रख लिया जाता है।
इन खास हिस्सों को दुनिया भर के बड़े म्यूजियम, इस्लामिक संस्थाओं और सऊदी अरब में मौजूद विदेशी दूतावासों के राजनयिकों को उपहार के रूप में सौंप दिया जाता है। इसके कुछ छोटे टुकड़े सऊदी अरब के महत्वपूर्ण अधिकारियों और मेहमानों को भी दिए जाते हैं। यही वजह है कि कई बार इस ऐतिहासिक और पवित्र कपड़े के टुकड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी देखने को मिल जाते हैं।

