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ईरान-अमेरिका समझौते से किसे मिला फायदा और किसका हुआ भारी नुकसान

अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया समझौते के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके सियासी और सैन्य नतीजों का आकलन शुरू हो गया है। रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में ईरान एक मजबूत ताकत बनकर उभरा है। दूसरी ओर इस युद्ध में सबसे बड़ा झटका इजरायल को लगा है। मध्य पूर्व के इस संकट में अमेरिका और उसके सहयोगी अरब देशों को भारी कूटनीतिक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। इस समझौते के बाद से वैश्विक बाजार और आम जनता ने बड़ी राहत की सांस ली है क्योंकि इस तनाव की वजह से दुनिया भर में महंगाई और बेरोजगारी का संकट गहराने लगा था।

कूटनीति के मोर्चे पर पाकिस्तान की बड़ी कामयाबी

इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ के रूप में सामने आया है। ईरान और अमेरिका के बीच दशकों पुराने कड़वे रिश्तों को शांत कराने में पाकिस्तानी कूटनीति की हर तरफ तारीफ हो रही है। इस समझौते के सफल होने से अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की छवि में बड़ा सुधार देखा जा रहा है। आतंकवाद को बढ़ावा देने के पुराने आरोपों के बीच इस शांति वार्ता को सफल कराकर उसने अपनी वैश्विक साख मजबूत की है। इस बड़ी कामयाबी के बाद अब पाकिस्तान को यूरोपीय देशों, अमेरिका और अमीर अरब मुल्कों से बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद और वित्तीय ग्रांट मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

इजरायल के सैन्य गौरव और मोसाद की खुली पोल

सैन्य विश्लेषकों के अनुसार इस युद्ध में इजरायल को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। इजरायल की जिस खुफिया एजेंसी मोसाद का दुनिया भर में दबदबा माना जाता था, उसकी रणनीतिक विफलता उजागर हो गई है। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इजरायल के उस दावे को हवा में उड़ा दिया जिसमें वह अपनी सुरक्षा प्रणाली को पूरी तरह अभेद्य बताता था। युद्ध के दौरान ईरानी मिसाइलों ने इजरायल के कई प्रमुख शहरों को भारी नुकसान पहुंचाया है। सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई तस्वीरों से साफ है कि इजरायल के कई इलाके मलबे के ढेर में तब्दील हो गए हैं।

पांच दशकों का गेम प्लान हुआ पूरी तरह फेल

इजरायल पिछले पचास वर्षों से ईरान को कूटनीतिक और सैन्य रूप से घेरने की योजना पर काम कर रहा था। उसकी कोशिश थी कि ईरान को भी इराक की तरह पूरी तरह तबाह कर दिया जाए ताकि पूरे मध्य पूर्व के क्षेत्र में इजरायल की एकछत्र बादशाहत कायम हो सके। इसके लिए इजरायल ने लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुष्प्रचार किया कि अगर ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बन गया तो वह पूरी दुनिया की शांति के लिए खतरा पैदा कर देगा। इसी तरह का नैरेटिव पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी समय-समय पर बनाया जाता रहा है। इसके उलट वे देश खुद अपनी परमाणु ताकत लगातार बढ़ाते रहे जो ईरान जैसे मुस्लिम देशों को कमजोर देखना चाहते थे।

इजरायल ने अमेरिका को प्रभावित करके ईरान पर लंबे समय तक कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगवाए ताकि उसकी आर्थिक कमर तोड़ी जा सके। भारत के एक वरिष्ठ सैन्य विशेषज्ञ का कहना है कि इजरायल पिछले चालीस साल से अमेरिकी राष्ट्रपतियों को इस बात के लिए राजी करने में जुटा था कि ईरान का खात्मा ही दुनिया में शांति ला सकता है। पूर्व में कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने इस सीधे टकराव से दूरी बनाए रखी। यहां तक कि डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपने पहले कार्यकाल में इजरायल के इस आक्रामक रुख का समर्थन नहीं किया था।

ट्रंप की रणनीतिक चूक और ईरान का पलटवार

अपने दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इजरायल के कूटनीतिक जाल में आ गए। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके सैन्य जनरलों ने ट्रंप को आश्वस्त कर दिया था कि ईरान पर हमला करने का यह सबसे सही समय है। उनका अनुमान था कि हमले के बाद ईरान के भीतर आंतरिक विद्रोह भड़क जाएगा और वहां अमेरिका अपनी पसंद की सरकार या शीर्ष नेता नियुक्त कर सकेगा।

इस सहमति के बाद ईरान पर भीषण सैन्य कार्रवाई की गई। एक स्कूल पर हुए हमले में कक्षा के भीतर ही 150 से अधिक मासूम बच्चियों की मौत हो गई। इसके बाद ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और 50 से अधिक शीर्ष सैन्य कमांडरों और राजनेताओं को निशाना बनाया गया। इस बड़े झटके के बाद पश्चिमी देशों को लगा कि ईरान का वजूद अब खत्म हो चुका है लेकिन ईरान ने अपने आधुनिक ड्रोन और मिसाइलों के जखीरे से इजरायल और खाड़ी देशों में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। इन हमलों ने इजरायल और अमेरिका के सारे रणनीतिक अनुमानों को ध्वस्त कर दिया।

खाड़ी देशों और अमेरिका को लगा तगड़ा झटका

ईरान के इस कड़े प्रतिरोध ने उन अरब देशों को भी चौंका दिया जो अब तक इजरायल की सैन्य तकनीक और खुफिया क्षमता को सर्वश्रेष्ठ मानकर उसके हथियारों के खरीदार बने हुए थे। ईरान ने साबित कर दिया कि पिछले चालीस वर्षों के प्रतिबंधों के बावजूद उसने खुद को सैन्य रूप से आत्मनिर्भर और बेहद मजबूत बना लिया है। इस युद्ध की वजह से संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और कतर जैसे खाड़ी देशों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है। खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिका के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने इस जंग में तबाह हो गए जिससे अमेरिका के लाखों करोड़ डॉलर पानी में बह गए।

युद्ध के प्रमुख परिणाम:
1. अमेरिका को ईरान की शर्तों पर शांति समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
2. वाशिंगटन और तेल अवीव के कूटनीतिक रिश्तों में भारी कड़वाहट आ गई है।
3. मुस्लिम जगत के आम नागरिकों में खाड़ी देशों की सरकारों के प्रति नाराजगी बढ़ी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ा इजरायल

हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स ने इजरायल के एक प्रमुख मीडिया घराने के हवाले से लिखा है कि इजरायली सैन्य अधिकारी इस समझौते से बेहद निराश और मायूस हैं। उन्हें डर है कि इस शांति समझौते के बाद इजरायल की आक्रामक सैन्य नीति और रक्षा बजट में भारी कटौती हो सकती है। वैश्विक स्तर पर भी इजरायल की छवि को गहरा धक्का लगा है और वह दुनिया में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। कई देश अब मानने लगे हैं कि इजरायल के साथ करीबी रिश्ते रखने का मतलब खुद को विवादों में धकेलना है। इस बीच भारतीय वेबसाइटों पर इजरायल के पक्ष में मदद जुटाने से जुड़ी तमाम सामग्रियां और प्रचार अभियान देखे जा रहे हैं जो उसकी मौजूदा बदहाली को बयां करते हैं।